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फालिदास ।

में लिप्त होने पर भी, मैंमले जमाने के भारतवासियों में, धार्मिक और दार्शनिक यातों की कल्पना की शक्ति कितनी थी।

ऋतु-संहार में कालिदास के समय की सम्पता की प्रारम्भिक अवस्था का चित्र है। रघुवंश, पीर-चरिष-सम्बन्धी काव्य है। मेघदूत शोक-सङ्गीत का उदाहरण है। शकुन्तला नाटक सम्बन्धी चित्र है और कुमार-सम्भव धार्मिक और दार्शनिक कथा है। कालिदास ने अपने समय की सभ्यता के अनेक तरह के चित्र अपने फाव्यों में दिखाये हैं। इसीसे, घाल्मीकि और व्यास की तरह ये भी अपने समय की सभ्यता के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

इस प्रकार हजारों वर्ष में भारत ने विविध विषयों का अनुभव प्राप्त किया। किन्तु दुःख का विषय है, दुर्भाग्य- यश, उसे इस अनुभव से लाभ उठाने का अवसर न मिला। इसके बाद ही चौथी अवस्था आती, जिसमें पूर्वोक तीनों ययस्थाओं का एकत्र समावेश होता। पर इसके पहले ही असभ्य लोगों का आकमण उस पर प्रारम्भ हो गया। इस पत्ति में पड़ जाने से उसका सामाजिक जीवन छिन-मित हो गया। शङ्कराचार्य ने इस चौथी अयस्या की नीय डाली

थी। उन्होंने साफार मत को सिर करके, ईश्वरोपासना

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