पृष्ठ:कार्ल मार्क्स पूंजी २.djvu/७२

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उत्पादक पूंजी का परिपथ ७१ पूंजी के एक ऐसे परिपथ , जो सामान्य परिचलन का अंग है और एक ऐसे परिपथ के वीच , जिसकी कड़ियां किसी अन्य स्वाधीन परिपथ में हों, सम्बन्ध आगे चलकर प्रकट होता है, जब हम द्र' के परिचलन की परीक्षा करते हैं, जो द्र+द्र के वरावर है। द्रव्य पूंजी की हैसियत से द्र पूंजी का परिपथ जारी रखता है। आय की हैसियत से ख़र्च किये जाने पर (द्र -मा), द्र सामान्य परिचलन में प्रवेश करता है, पर वह पूंजी के परिपथ से फ़ौरन बाहर श्रा जाता है। वादवाले परिपथ में केवल वही अंश प्रवेश करता है, जो अतिरिक्त द्रव्य पूंजी का कार्य करता है। मा-द्र- मा में द्रव्य केवल सिक्के का काम करता है। इस परिचलन का उद्देश्य पूंजीपति का व्यक्तिगत उपभोग है। अनगढ़ अर्थशास्त्र की जड़ता यहां बहुत साफ़ जाहिर हो जाती है, जब वह इस परिचलन को, जो पूंजी के परिपथ में प्रवेश नहीं करता-- उत्पादित मूल्य के उस भाग के परिचलन को, जिसका उपयोग आय की हैसियत से होता है-पूंजी का लाक्षणिक परिपथ बताता है। दूसरे दौर, द्र - मा में , पूंजी मूल्य द्र पुनः विद्यमान होता है, जो वरावर है उ के ( उत्पादक पूंजी का वह मूल्य , जो इस विन्दु पर औद्योगिक पंजी के परिपथ को शुरू करता है)। द्र अपने वेशी मूल्य से रहित हो चुका है और इसलिए उसका वही मूल्य परिमाण होता है, जो द्रव्य पूंजी के परिपथ की पहली मंज़िल द्र मा में था। स्थान भेद होने पर भी जिस द्रव्य पूंजी माल पूंजी अव रूपान्तरित हो गई है, उसका कार्य वही बना रहता है : उसका उ सा तथा श्र में, उत्पादन साधनों और श्रम शक्ति में, रूपान्तरण । फलतः माल पूंजी के कार्य में , मा-द्र' में , मा-द्र के साथ ही साथ पूंजी मूल्य भी मा-द्र के दौर से गुजर चुका होता है, और अब वह पूरक दौर द्र-मा < - . उसा उस रूप में प्रवेश करता है। इसलिए उसका सम्पूर्ण परिचलन यह होता है : मा-द्र-मा< पहले , द्रव्य पूंजी द्र रूप १ (परिपथ द्र द्र') में, उस मूल रूप में प्रकट हुई, जिसमें पूंजी मूल्य पेशगी दिया जाता है। प्रारम्भ से ही यहां वह उस द्रव्य राशि के भाग के रूप में प्रकट होती है जिसमें माल पूंजी परिचलन के पहले दौर माद्र' में रूपान्तरित हुई थी। इसलिए वह प्रारम्भ से ही मालों की बिक्री के माध्यम से द्रव्य रूप में उत्पादक पूंजी उ का रूपान्तरण बनकर प्रकट होती है। यहां प्रारम्भ से द्रव्य पूंजी पूंजी मूल्य की हैसियत से विद्यमान होती है, जो न तो उसका मूल रूप और न ही उसका अन्तिम रूप है, क्योंकि द्र मा दौर, जो मा-द्र दौर को निष्पन्न करता है, द्रव्य रूप को पुनः तजने पर ही सम्पन्न किया जा सकता है। इसलिए द्र मा का वह भाग, जो साथ ही श्र भी है, अव श्रम शक्ति की खरीदारी में पेशगी दिया द्रव्य मान नहीं रह जाता, वरन वह ऐसी पेशगी होता है, जिसके माध्यम से वही ५० पाउंड का १,००० पाउंड सूत , जो श्रम शक्ति द्वारा निर्मित माल मूल्य का अंग है, श्रम शक्ति को द्रव्य रूप में पेशगी दिया जाता है। श्रमिक को जो द्रव्य यहां पेशगी दिया जाता है, वह स्वयं उसके द्वारा उत्पादित माल मूल्य के एक भाग का परिवर्तित समतुल्य है। और यदि अन्य किसी कारण नहीं, तो ,