पृष्ठ:कार्ल मार्क्स पूंजी २.djvu/५८

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द्रव्य पूंजी का परिपथ + प्रारम्भ उत्पादन 3 " सामान्य सूत्र में उ का उत्पाद ऐसा भौतिक पदार्थ माना गया है, जो उत्पादक पूंजी के तत्वों से भिन्न है- एक ऐसी चीज़ , जो उत्पादन प्रक्रिया से अलग विद्यमान है और जिसका उपयोग रूप उत्पादन तत्वों के उपयोग रूप से भिन्न है। उत्पादन प्रक्रिया का परिणाम जब किसी वस्तु का रूप धारण करता है, तव सदा ही ऐसा होता है; जव उत्पाद का एक अंश पुनः एक तत्व की हैसियत से उसमें पुनः प्रवेश करता है, तब भी ऐसा होता है। उदाहरण के लिए, अनाज अपने ही उत्पादन के लिए वीज का काम करता है, लेकिन उपज केवल अनाज ही होती है। इसलिए श्रम शक्ति , औज़ारों, खाद जैसे सम्बद्ध तत्वों के रूपों से उसका रूप भिन्न होता है। लेकिन उद्योग की कुछ स्वतन्त्र शाखाएं होती हैं, जिनमें उत्पादन प्रक्रिया का उत्पाद कोई नई भौतिक वस्तु नहीं होता, कोई माल नहीं होता। इनमें आर्थिक दृष्टि से केवल संचार उद्योग महत्वपूर्ण है, फिर वह चाहे सामान और लोगों को ढोने के अपने विशेष परिवहन कार्य में लगा हो, चाहे चिट्ठियां , तार, संदेश , वगैरह पहुंचाने भर का काम कर रहा हो। इस विषय पर अ० चप्रोव ने लिखा है : “कारखानेदार चाहे तो पहले माल तैयार कर ले और फिर उपभोक्ताओं की तलाश करे" [तैयार होने पर उसका उत्पाद उत्पादन प्रक्रिया से निकल जाता है और उससे पृथक माल के रूप में परिचलन में प्रवेश करता है] ; उत्पादन और उपभोग ऐसी दो क्रियाएं हैं, जो देश-काल में एक दूसरे से अलग हैं। परिवहन उद्योग किसी नये उत्पाद का निर्माण नहीं करता, केवल चीज़ों और लोगों को स्थानान्तरित करता है। वहां ये दोनों क्रियाएं एक साथ होती जाती हैं। इसकी सेवाओं का" [स्थानान्तरण का] "जैसे ही उत्पादन होता है, वैसे ही उनका उपभोग भी हो जाता है। इस कारण रेलें जिस परिधि में अपनी सेवाएं बेच सकती हैं, वह रेलवे लाइन के आसपास , बहुत से बहुत , ५० वेर्ता ( ५३ किलोमीटर ) तक होती है। चाहे लोगों का परिवहन हो, चाहे सामान का , परिणाम उनका स्थान परिवर्तन ही होता है। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि सूत अव इंगलैण्ड में न हो, जहां उसका उत्पादन हुआ था, वल्कि भारत में हो। किन्तु परिवहन उद्योग जो चीज़ वेचता है, वह स्थान परिवर्तन ही है। उसका उपयोगी परिणाम परिवहन प्रक्रिया से , अर्थात परिवहन उद्योग की उत्पादक प्रक्रिया से, अभिन्न रूप में जुड़ा हुआ है। लोग और सामान परिवहन के साधनों के साथ-साथ यात्रा करते हैं और यह यात्रा कार्य , यह चलन , उत्पादन की वह प्रक्रिया है, जो परिवहन साधनों से सम्पन्न होती है। उपयोगी परिणाम का उपभोग उत्पादन प्रक्रिया के दौरान ही किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से भिन्न किती उपयोगिता की हैसियत से वह विद्यमान नहीं रहता। वह उपयोग में ग्रानेवाली ऐसी चीज़ नहीं है कि जो जब तक उत्पादित न कर ली जाये, तब तक व्यापार की चीज़ न बनेगी, वस्तु के रूप में जिसका परिचलन न होगा। किसी अन्य माल के समान इस उपयोगी परिणाम का विनिमय मूल्य भी उन उत्पादन तत्वों (श्रम शक्ति और उत्पादन साधनों) के मूल्य द्वारा निर्धारित होता है, जो उसमें उपभुक्त हुए हैं, और इसके साथ उस वेशी मूल्य द्वारा निर्धारित होता है, जिसका सृजन परिवहन में लगे हुए श्रमिकों के वेशी श्रम ने किया है। उपभोग से यह उपयोगी परिणाम वही सम्बन्ध रखता है, जो अन्य पण्य वस्तुएं रखती हैं। . "अ० चुप्रोव, 'रेल-उद्योग', मास्को, १८७५, पृष्ठ ६६-७० [रूसी में। - सं०] ।