पृष्ठ:कार्ल मार्क्स पूंजी १.djvu/८३९

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तीसवां अध्याय कृषि क्रान्ति को उद्योग में प्रतिक्रिया।-प्रौद्योगिक पूंजी के लिये घरेलू मण्डी का जन्म 2 खेतिहर माबादी के सम्पत्ति-अपहरण और निष्कासन की क्रिया बीच-बीच में रुक जाती थी, पर वह हर बार नये सिरे से शुरू हो जाती थी। जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं, इस क्रिया से शहरों को सर्वहारा मजदूरों की एक ऐसी विशाल संख्या प्राप्त हुई थी, जिसका संगठित शिल्पी संघों से तनिक भी सम्बंध न था और जिसके लिये इन शिल्पी संघों के बंधनों का कोई अस्तित्व नपा। यह परिस्थिति इतनी सुविधाजनक थी कि पुट ए० ऐपसन ने (जिनको जेम्स ऐपर्सन के साथ नहीं गड़बड़ा देना चाहिये) तो अपने "History of Commerce" ('वाणिज्य का इतिहास') म यह मत प्रकट किया है कि इस बीच के पीछे पर भगवान का प्रत्यक्ष हाप रहा होगा। यहां हमें फिर एक क्षण के लिये रुककर माविम संचय के इस तत्व पर विचार करना होगा। स्वतंत्र, प्रात्म-निर्भर किसानों की संख्या कम हो जाने का केवल यही फल नहीं हुमा कि शहरों में प्रौद्योगिक सर्वहारा की उसी तरह रेल-पेल होने लगी, जिस तरह ज्योफी सेंट हिलेयर की व्याख्या के अनुसार बब अन्तरिलीय पदार्थ का एक स्थान पर विरसन हो जाता है, तो दूसरे स्थान पर उसका संघनन हो जाता है। भूमि के जोतने वालों की संख्या तो पहले से कम हो गयी थी, पर उपज पहले जितनी ही या उससे भी अधिक होती थी, क्योंकि भू-सम्पत्ति के मों में कान्ति होने के साथ-साथ खेती के तरीकों में अनेक सुधार हो गये थे, पहले से अधिक सहकारिता का प्रयोग होने लगा था, उत्पादन के साधनों का संकण हो गया था, इत्यादि, - - को जो लगान देना पड़ता था, वह जिन्स या मुद्रा के रूप में उनकी उपज के बारहवें हिस्से से लेकर पांचवें हिस्से तक होता था। इन फ़ार्मों की हैसियत उनके मूल्य तथा विस्तार के अनुसार जागीरों और उप-जागीरों (fiefs, arriere-fiefs) प्रादि की होती थी। उनमें से बहुत से तो केवल कुछ ही एकड़ के फ़ार्म थे। लेकिन इन काश्तकारों को अपनी भूमि पर रहने वालों के मुकदमे निपटाने का कुछ हद तक अधिकार प्राप्त था। इस प्रकार के अधिकारों की चार कोटियां थीं। ये छोटे-छोटे अत्याचारी खेतिहर माबादी पर कैसा बुल्म करते होंगे, यह भासानी से समझ में पा सकता है। मौन्तील ने बताया है कि फ्रांस में, जहां पाजकल मय स्थानीय मजिस्ट्रेटों के केवल ४,००० अदालतें काफ़ी है, एक समय १,६०,००० न्यायाधीश थे। ज्योफ़ी सेंट हिलेयर [Geoffroy Saint Hilaire] ने यह बात अपनी रचना "Notions de Philosophie Naturelle" (Paris,. 1838) में कही है।