पृष्ठ:कार्ल मार्क्स पूंजी १.djvu/६२

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माल ५९ भूमिका बहुत प्रबना उंग की होती है। क वही बात यहां मामूली मानव-श्रम पर भी लागू होती है। मामूली मानव-पम साधारण बम-शक्ति को, अर्थात् उस मम-शक्ति को, बर्च करता है, वो पोसत ढंग से और किसी विशेष विकास के बिना हर साधारण व्यक्ति के शरीर में मौजूर होती है। यह सच है कि साधारण प्रोसत मम का म अलग-अलग देशों और अलग-अलग कालों में बदलता रहता है, लेकिन किसी भी वास समाज में उसका एक निश्चित रूप होता है। निपुण मम की गिनती केवल साधारण मन के गहन प में, या शायद यह कहना स्याना सही होगा कि साधारण भन के गुणित स्म में होती है, और निपुण भम की एक निश्चित मात्रा साधारण भम की उससे अधिक मात्रा के बराबर समझी जाती है। अनुभव बताता है कि हम इस तरह निपुन भन को लगातार साधारण श्रम में बदलते रहते हैं। कोई माल अत्यन्त निपुण मम की पैसवार हो सकता है, लेकिन उसका मूल्य कि साधारण पनिपुण मम की पैदावार के साथ उसका समीकरण कर देता है, इसलिए वह केवल साधारण पनिपुण श्रम की किसी निश्चित मात्रा का ही प्रतिनिधित्व करता है। अलग-अलग ढंग का मम बिन भिन्न-भिन्न अनुपातों में उनके मापदण्ड के रूप में साधारण मनिपुन मन में बदला जाता है, एक ऐसी सामाजिकमिया के द्वारा निर्धारित होते हैं, जो पैदा करने वालों की पीठ पीछे चलती रहती है, और इसलिए रीति-रिवाज के चरिये निश्चित हुए लगते हैं। विषय को सरल बनाने की दृष्टि से हम मागे हर तरह के मन को अनिपुण, साधारण बम मानकर चलेंगे। ऐसा करके हम केवल निपुण भम को हर बार साधारण श्रम में बदलने के संझट से बच जायेंगे। इसलिए, जिस प्रकार हम कोट और कपड़े पर मूल्यों के म में विचार करते समय उनके अलग-अलग उपयोग-मूल्यों को उनसे अलग कर देते हैं, वही बात उस श्रम पर लागू होती है, विसका ये मूल्य प्रतिनिधित्व करते हैं, यानी हम इस बम के उपयोगी पों-सिलाई और बुनाई- के अन्तर को अनदेखा कर देते हैं। उपयोग-मूल्यों के रूप में कोट और कपड़ा वो खास तरह की उत्पावक पियानों के साथ बस्त्र और सूत के योग हैं, जबकि दूसरी मोर, मूल्य-कोट और कपड़ा-मभिन्नित मम के सबातीय जमाव मात्र है। इस कारण, इन मूल्यों में निहित श्रम का महत्व इस बात में नहीं होता कि वस्त्र और सूत के साथ उसका कोई उत्पादक सम्बंध है, बल्कि उसका महत्व केवल इस बात में होता है कि इनमें मानव-मन-शक्ति हुई है। कोट और कपड़े के रूप में उपयोग-मूल्यों के सुबन में सिलाई और बुनाई गक इसीलिये पावश्यक तत्वों का काम करती है कि गुणगत दृष्टि से श्रम के ये दो प्रकार अलग-अलग हैं। लेकिन सिलाई और बुनाई कोट और कपड़े के मूल्यों के केवल उसी हद तक तत्व बनती हैं, जिस हब तक कि मम के इन दो प्रकारों को उनके विशेष गुणों से अलग कर दिया जाता है और जिस हर तक कि इन दोनों प्रकारों में मानव-पम होने का एक सा गुण मौजूद रहता है। किन्तु कोट और कपड़ा केवल मूल्य ही नहीं, बल्कि निश्चित मात्रा के मूल्य है, और 1 . . तुलना कीजिये Hegel की रचना "Philosophie des Rechts" से, Berlin, 1840, पु. २५०, पैरा १९०। पाठक को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हम यहां मजदूरी की या मजदूर को एक निश्चित श्रम-काल का जो मूल्य मिलता है, उसकी चर्चा नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम यहां माल के उस मूल्यं की चर्चा कर रहे है, जिसमें उस श्रम-काल ने भौतिक रूप धारण किया है। मजदूरी एक ऐसी चीप है, जिसका प्रभी, हमारी बोज की मौजूदा मंजिल पर, कोई अस्तित्व नहीं है।