पृष्ठ:कार्ल मार्क्स पूंजी १.djvu/६११

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६०८ पूंजीवादी उत्पादन . ३ . यह समझना चाहिये कि दैनिक मजदूरी, साप्ताहिक मजदूरी मादि की कुल कम और श्रम के नाम में भेद होता है। तब इस बाम का -अर्थात् मम को एक निश्चित मात्रा के एवज में दिये गये मुद्रा मूल्य का-कैसे पता लगाया जाये ? जब अम-शक्ति के प्रोसत दैनिक मूल्य को काम के दिन के घंटों की प्रोसत संस्था से भाग दिया जाता है, तो हमें श्रम का पोसत बाम मालूम हो जाता है। मिसाल के लिये, यदि बम-शक्ति का वैनिक मूल्य ३ शिलिंग है, जो कि ६ घण्टों के भम की पैदावार के मूल्य के बराबर होता है, और यदि काम का दिन १२ घण्टों का है, तो १ घण्टे का बाम शिलिंग या ३ पेंस बैठता है। इस प्रकार, काम के घण्टे का जो दाम १२ हमें मालूम हो जाता है, वह श्रम के दाम को मापने की इकाई का काम करता है। इसलिये इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि श्रम के दाम के बराबर गिरते जाने पर भी यह मुमकिन है कि दैनिक मजदूरी, साप्ताहिक मजदूरी मावि ज्यों की त्यों बनी रहें। मिसाल के लिये, यदि प्रचलित काम का दिन १० घण्टे का है और मम-शक्ति का दैनिक मूल्य ३ शिलिंग है, तो काम के एक घन्टे का बाम ३. + पेन्स बैठता है। जैसे ही काम का दिन बढ़कर १२ घन्टे का हो जाता है, वैसे ही यह वाम घटकर ३ पेन्स, और जैसे ही काम का दिन १५ घरे का हो जाता है, वैसे ही काम के एक घण्टे का बाम केवल २ पेन्स ही रह जाता है। परन्तु इस सब के बावजूद दैनिक या साप्ताहिक मजदूरी ज्यों की त्यों बनी रहती है। इसके विपरीत, यह भी मुमकिन है कि बम का दाम स्थिर रहे या यहां तक कि कम हो जाये, पर बैनिक या साप्ताहिक मजदूरी बढ़ पाये। मिसाल के लिये, यदि काम का दिन १० घण्टे का है और अम-शक्ति का दैनिक मूल्य ३ शिलिंग है, तो काम के एक घन्टे का बाम ३, पेन्स बैठता है। यदि व्यवसाय में तेजी पाने के फलस्वरूप मजदूर १२ घन्टे रोग काम करने लगता है, पर मम का नाम ज्यों का त्यों बना रहता है, तो उसकी दैनिक मजदूरी बढ़कर ३ शिलिंग ७ःस हो जायेगी, हालांकि श्रम के दाम में कोई तबदीली नहीं पायेगी। यदि मम के विस्तार में वृद्धि होने के बजाय उसकी तीव्रता में वृद्धि हो जाये, तो उसका भी यही मतीचा होगा। इसलिये नाम-मात्र को दैनिक या साप्ताहिक मजबूरी में वृद्धि होने के साप-साथ . 1 11 gera "Essay on the Application of Capital to Land. By a Fellow of the Uni- versity College of Oxford" ('भूमि पर पूंजी के उपयोग के विषय में एक निबंध । मोक्सफ़ोर्ड के यूनिवर्सिटी-कालेष के एक फैलो द्वारा') (London, 1815) लिखी है। अर्थशास्त्र के इतिहास में यह एक युगान्तरकारी पुस्तक है। 'श्रम की मजदूरी श्रम के दाम और इस बात पर निर्भर करती है कि कितना श्रम किया गया है... यदि श्रम की मजदूरी में वृद्धि हो जाती है, उसका लाजिमी तौर पर यह मतलब नहीं होता कि श्रम का दाम भी बढ़ गया है। श्रम का दाम ज्यों का त्यों बना रहते हुए भी यदि मजदूर के समय का अधिक पूर्ण उपयोग किया जाता है और वह पहले से अधिक मेहनत करता है, तो श्रम की मजदूरी में काफी वृद्धि हो सकती है।" (वेस्ट , उप० पु०, पृ. ६७,