पृष्ठ:कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स.djvu/४७

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वर्ग-संघर्ष का , विशिष्ट सामाजिक वर्गों द्वारा दूसरे वर्गों पर शासन और विजय का, इतिहास रहा है। और यह तब तक जारी रहेगा जब तक वर्ग- संघर्ष और वर्ग-शासन की बुनियादों - निजी संपत्ति और अव्यवस्थित सामाजिक उत्पादन - का लोप नहीं होगा। सर्वहारा के हितों की दृष्टि से इन बुनियादों का नाश होना आवश्यक है और इसलिए संगठित मजदूरों के सचेतन वर्ग- संघर्ष का रुख़ इनके विरुद्ध मोड़ देना चाहिए। और हर वर्ग-संघर्ष एक राजनीतिक संघर्ष है।

मार्क्स और एंगेल्स के ये दृष्टिकोण अब अपनी मुक्ति के लिए लड़नेवाले सभी सर्वहारा ने अंगीकार कर लिये हैं। पर जब १६ वीं शताब्दी के ५ वें दशक में उक्त मित्र-द्वय ने अपने समय के समाजवादी साहित्य- सृजन और सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया उस समय ये मत पूर्णतया नवीन थे। उस समय बहुत-से ऐसे लोग थे जो राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष में, राजा-महाराजाओं, पुलिस और पादरियों की स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध संघर्ष में रत होते हुए भी पूंजीवादी वर्ग के हितों और सर्वहारा के हितों के बीच का विरोध-भाव न देख पाये। इनमें प्रतिभाशाली लोग थे और प्रतिभाहीन भी , ईमानदार लोग थे और बेईमान भी। ये लोग यह विचार स्वीकार तक न करते थे कि मजदूर एक स्वतंत्र सामाजिक शक्ति के रूप काम करें। दूसरी ओर, कितने ही ऐसे स्वप्नदर्शी थे, और इनमें से कुछ प्रतिभाशाली भी थे, जो मानते थे कि बस , शासकों और शासक वर्गों को समकालीन समाज-व्यवस्था के अन्याय के बारे में विश्वास दिलाने भर की ज़रूरत है , फिर धरती पर शांति और आम खुशहाली की स्थापना करना बायें हाथ का खेल हो जायेगा। वे बिना संघर्ष के समाजवाद के स्वप्न देखा करते थे। अंततः, उस समय के लगभग सभी समाजवादी और आम तौर पर मजदूर वर्ग के मित्र सर्वहारा को एक फोड़ा भर मानते थे और भयग्रस्त होकर देखते थे कि उद्योग की वृद्धि के साथ यह फोड़ा भी कैसे बड़ा होता जा रहा था। अतः, वे सब इस बात पर तुले हुए थे कि उद्योग का और सर्वहारा का विकास कैसे रोका जाये , “इतिहास का पहिया" कैसे रोका जाये। सर्वहारा के विकास के आम भय में अंशभागी होना तो दूर ही रहा, उल्टे मार्क्स और एंगेल्स सर्वहारा की अप्रतिहत वृद्धि पर अपनी सारी आस

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