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[कायाकल्प
 


सिपाही—खुद महाराज साहब ने।

मनोरमा—मैं केवल एक मिनट के लिए राजा साहब से मिलना चाहती हूँ।

सिपाही—बड़ी कड़ी ताकीद है सरकार, हमारी जान न बचेगी।

मनोरमा ऐंठकर रह गयो। एक दिन सारी रियासत उसके इशारे पर चलती थी। आज पहरे के सिपाही तक उसकी बात न सुनते। तब और अब में कितना अन्तर है!

मनोरमा ने वहीं खड़े-खड़े पूछा—बरात निकलने में कितनी देर है।

सिपाही—अब कुछ देर नहीं है। सब तैयारी हो चुकी हैं।

मनोरना—राजा साहब की सवारी के साथ पहरे का कोई विशेष प्रबन्ध भी किया गया है?

सिपाही—हाँ हुजूर! महाराज के साथ एक सौ गोरे रहेंगे। महाराज की सवारी उन्हीं के बीच में रहेगी।

मनोरमा सन्तुष्ट हो गयी। उसकी इच्छा पूरी हो गयी। राजा साहब सावधान हो गये, किसी बात का खटका नहीं। वह अपने कमरे में लौट गयी।

चार बनते-बजते बरात निकली। जुलूस की लम्बाई दो मील से कम न थी। भाँति-भाँति के बाजे बज रहे थे, रुपये लुटाये जा रहे थे, पग पग पर फूलों की वर्षा की जा रही था। सारा शहर तमाशा देखने को फटा पड़ता था।

इसी समय अहल्या और शंखधर ने नगर में प्रवेश किया और राजभवन की ओर चले, किन्तु थोड़ी ही दूर गये थे कि बरात के जुलुस ने रास्ता रोक दिया। जब यह मालूम हुआ कि महाराज विशालसिंह की बरात है, तो शंखधर ने मोटर रोक दी और उसपर खड़े होकर अपना रूमाल हिलाते हुए जोर से बोले—सब आदमी रुक जायँ, कोई एक कदम भी आगे न बढ़े! फौरन महाराजा साहब को सूचना दी कि कुँवर शंखधर आ रहे हैं।

दम-के-दम में सारी बरात रुक गयी। 'कुँवर साहब आ गये!' यह खबर वायु के झोंके की भाँति इस सिरे से उस सिरे तक दौड़ गयी। जो जहाँ था, वहीं खड़ा रह गया। फिर उनके दर्शन के लिए लोग दौड़े-दौड़कर जमा होने लगे। सारा जुलूस तितर-बितर हो गया। विशालसिंह ने यह भगदड़ देखी, तो समझे, कुछ उपद्रव हो गया। गोरों का तैयार हो जाने का हुक्म दे दिया । कुछ अँधेरा हो चला था। किसी ने राजा साहब से साफ तो न कहा कि कुँवर साहब आ गये, बस जिसने सुना, झण्डी-झण्डे, बल्लम भाले फेंक फाँककर भागा। राजा साहब का घबरा जाना स्वाभाविक ही था। उपद्रव की शंका पहले ही से थी। तुरत खयाल हुआ कि उपद्रव हो गया। गोरों को बन्दूक सँभालने का हुक्म दिया।

उसी क्षण शंखधर ने सामने आकर राजा साहब को प्रणाम किया!

शंखधर को देखते ही राजा साहब घोड़े से कूद पड़े और उसे छाती से लगा लिया। आज इस शुभ मुहूर्त में, वह अभिलाषा भी पूरी हो गयी, जिसके नाम को वह रो चुके