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[कायाकल्प
 


अब बहुत अच्छी हो गयी थी, रुविर के बढ जाने से जितने रोग उत्पन्न होते हैं, उनकी अब कोई सम्भावना न थी।

दीवान साहब को पाचन शक्ति अच्छी हो गयी हो; पर विचार शक्ति तो जरूर क्षीण हो गयी थी। निश्चय करने की अब उनमे सामर्थ्य हो न थी। ऐसी ऐसी गलतियाँ करते थे कि राजा साहब को उनका बहुत लिहाज करने पर भी बार बार एतराज करना पड़ता था। वह कार्यदक्षता, वह तत्परता, वह विचारशीलता, जिसने उन्हे चपरासी से दीवान बनाया था, अब उनका साथ छोड़ गयी थी। वह बुद्धि भला जगदीशपुर का शासन भार क्या सँभालती। लोगो को आश्चर्य होता था कि इन्हें क्या हो गया है। गुरुसेवक को भी शायद मालूम होने लगा कि पिताजी की याद में कोई दूसरी ही शक्ति रियासत का सञ्चालन करती थी।

एक दिन उन्होंने पिता से कहा―लौगी कब तक आयेगी?

दीवान साहब ने उदामीनता से कहा―उसका दिल जाने। यहाँ आने की तो कोई खास जरूरत नहीं मालूम होती। अच्छा है, अपने कर्मों का प्रायश्चित्त ही कर ले। यहाँ आकर क्या करेगी?

उसी दिन भाई बहन में भी इसी विषय पर बातें हुई। मनोरमा ने कहा― भैया, क्या तुमने लौंगी अम्माँ को भुला ही दिया? दादाजी की दशा देख रहे हो कि नहीं? सूखकर कॉटा हो गये हैं।

गुरुसेवक―भोजन तो करते ही नहीं। कोई क्या करे। वस, जब देखो शराब―शराब।

मनोरमा―उन्हें लौंगी अम्माँ ही कुछ ठीक रख सकती हैं। उन्हीं को किसी तरह वुलाओ और बहुत जल्द। दादाजी की दशा देखकर मुझे तो भय हो रहा है। राजा साहब तो कहते हैं, तुम्हारे पिताजी सठिया गये हैं।

गुरुसेवक―तो मैं क्या करूँ? बार-बार कहता हूँ कि बुला लीजिए, पर वह सुनते ही नहीं। उलटे उसे चिढाने को और लिख देते हैं कि यहाँ तुम्हारे आने की जरूरत नहीं! वह एक हठिन् है। भला, इस तरह क्यों आने लगी?

मनोरमा―नहीं भैया, वह लाख हठिन हो, पर दादानी पर जान देती है। वह केवल तुम्हारे भय से नहीं आ रही है। तीर्थयात्रा में उसकी श्रद्धा कभी न थी। वहाँ रो-रोकर उसके दिन कट रहे होंगे। पिताजी जितना ही उसे आने के लिए रोकते हैं, उतना ही उसे आने की इच्छा होती है, पर तुमसे डरती है।

गुरुसेवक―नोरा, मैं सच कहता हूँ, मैं दिल से चाहता हूँ कि वह आ जाय, पर सोचता हूँ कि जब पिताजी मना करते हैं, तो मेरे बुलाने से क्यों आने लगी। रुपए पैसे की कोई तकलीफ है ही नहीं।

मनोरमा―तुम समझते हो, दादानी उसे मना करते हैं? उनकी दशा देखकर भी ऐसा कहते हो! जब से अम्माँजी का स्वर्गवास हुआ, दादाजी ने अपने को उसके हाथों वेच दिया। लौंगी ने न सँभाला होता, तो अम्मॉजी के शोक में दादाजी प्राण दे देत।