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कायाकल्प]
२०३
 

चक्रधर पीछे घूमे ही थे कि निर्मला ने उनका हाथ पकड़ लिया और स्नेहपूर्ण तिरस्कार करती हुई बोली––बच्चा, तुमसे ऐसी आशा न थी। अब भी हमारा कहना मानो, हमारे कुल के मुँह मे कालिख न लगाओ।

चक्रधर ने हाथ छुड़ाकर कहा––मैंने आपकी आशा कमी भंग नहीं की, लेकिन इस विषय से मजबूर हूँ।

बज्रधर ने श्लेष के भाव से कहा––साफ-साफ क्यों नहीं कह देते कि हम आप लोगों से अलग रहना चाहते हैं।

चक्रधर––अगर आप लोगों की यही इच्छा है तो मैं क्या करूँ?

वज्रधर––यह तुम्हारा अन्तिम निश्चय है?

चक्रधर––जी हॉ, अन्तिम!

यह कहते हुए चक्रधर बाहर निकल आये और कुछ कपड़े साथ लेकर स्टेशन की ओर चल दिये।

थोड़ी देर के बाद निर्मला ने कहा––लल्लू किसी भ्रष्ट स्त्री को खुद ही न लायेगा। तुमने व्यर्थ उसे चिढ़ा दिया।

वज्रधर ने कठोर स्वर से कहा––अहल्या के भ्रष्ट होने से अभी कुछ कसर है?

निर्मला––यह तो मैं नहीं जानती; पर इतना जानती हूँ कि लल्लू को अपने धर्म-अधर्म का ज्ञान है। वह कोई ऐसी बात न करेगा, जिसमें निन्दा हो।

वज्रधर––तुम्हारी बात समझ रहा हूँ। बेटे का प्यार खींच रहा हो, तो जाकर उसी के साथ रहो। मैं तुम्हें रोकना नहीं चाहता। मैं अकेले भी रह सकता हूँ।

निर्मला––तुम तो जैसे म्यान से तलवार निकाले बैठे हो। वह विमन होकर कही चला गया तो?

वज्रधर––तो मेरा क्या बिगड़ेगा। मेरा लड़का मर जाय, तो भी गम न हो!

निर्मला––अच्छा, बस मुँह बन्द करो, बड़े धर्मात्मा बनकर आये हो। रिश्वत ले लेकर हड़पते दो, तो धर्म नहीं जाता; शराबें उड़ाते हो, तो मुँह में कालिख नहीं लगती; झूठ के पहाड़ खड़े करते हो, तो पाप नहीं लगता। लड़का एक अनाथिनों को रक्षा करने जाता है, तो नाक कटती है। तुमने कौन-सा कुकर्म नहीं किया? अब देवता बनने चले हो।

निर्मला के मुख से मुंशीजी ने ऐसे कठोर शब्द कभी न सुने थे। वह तो शील, स्नेह और पतिभक्ति की मूर्ति थी, आज कोप और तिरस्कार का रूप धारण किये हुए थी। उनकी शासक वृत्तियाँ उत्तेजित हो गयी। डाँटकर बोले––सुनो जो में ऐसी बातें सुनने का आदी नहीं हूँ। बाते तो नहीं सुनी मैंने अपने अफसरों को, जो मेरे भाग्य के विधाता थे। तुम किस खेत की मूली हो। जबान तालु से खींच लूंगा, समझ गयी? समझती हो न कि बेटा जवान हुआ। अब इस बुड्ढे को क्यों परवा करने लगी। तो अपर उसी भ्रष्टा के साथ रहो। इस घर में तुम्हारी जरूरत नहीं।