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कायाकल्प]
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गुरुसेवक––जरा घर में जाकर लोगों से मिल आओ। शिकायत करती थी कि बीबी अभी से हमें भूल गयीं।

मनोरमा––टालमटोल न कीजिए। मैं सब सामान यहीं लाये देती हूँ। आपको इसी वक्त लिखना पड़ेगा।

गुरुसेवक––तो तुम कब तक बैठी रहोगी? फैसला लिखना कोई मुंह का कौर थोड़े ही है।

मनोरमा––आधी रात तक खत्म हो जायगा? आज न होगा, कल होगा। मैं फैसला पढ़कर ही यहाँ से जाऊँगी। तुम दिल से चक्रधर को निर्दोष मानते हो, केवल स्वार्थ और भय तुम्हें दुविधा में डाले हुए हैं। मैं देखना चाहती हूँ कि तुम कहाँ तक सत्य का निर्वाह करते हो।

सहसा दूसरी मोटर आ पहुँची। इस पर राजा साहब बैठे हुए थे? गुरुसेवक बड़े तपाक से उन्हें लेने दौड़े। राजा ने उनकी ओर विशेष ध्यान न दिया। मनोरमा के पास आकर बोले––तुम्हारे घर से चला आ रहा हूँ। वहाँ पूछा तो मालूम हुआ––कहीं गयी हो; पर यह किसी को न मालूम था कि कहाँ। वहाँ से पार्क गया, पार्क से चौक पहुँचा, सारे जमाने की खाक छानता हुआ यहाँ पहुँचा हूँ। मैं कितनी बार कह चुका हूँ कि घर से चला करो, तो जरा बतला दिया करो।

मनोरमा––मैने समझा था, आपके पाने के वक्त तक लौट आऊँगी।

राजा––खैर, अभी कुछ ऐसी देर नहीं हुई। कहिए, डिप्टी साहब, मिजाज तो अच्छे हैं? कभी कभी भूलकर हमारी तरफ भी आ जाया कीजिए। (मनोरमा से) चलो, नहीं तो शायद जोर से पानी आ जाय।

मनोरमा––मैं तो आज न जाऊँगी।

राजा––नहीं नहीं, ऐसा न हो। वे लोग हमारी राह देख रहे होंगे।

मनोरमा––मेरा तो जाने को जी नहीं चाहता।

राजा––तुम्हारे बगैर सारा मजा किरकिरा हो जायगा, और मुझे बहुत लज्जित होना पड़ेगा। मैं तुम्हें जबरदस्ती ले जाऊँगा।

यह कहकर राजा साहब ने मनोरमा का हाथ आहिस्ता से पकड़ लिया और उसे मोटर की तरफ खींचा। मनोरमा ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और त्योरियाँ बदलकर बोली––एक बार कह दिया कि मैं न जाऊँगी।

राजा––आखिर क्यों?

मनोरमा––अपनी इच्छा!

गुरुसेवक––हुजूर, यह मुझसे जबरदस्ती जेलवाले मुकदमे का फैसला लिखाने बैठी हुई है। कहती हैं––बिना लिखवाये न जाऊँगी।

गुरूसेवक ने तो यह बात दिल्लगी से कही थी, पर समायोचित बात उनके मुंह से कम निकलती थी। मनोरमा का मुँह लाल हो गया। समझी कि यह मुझे राजा साहब के