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एक यवनिका हटी, पवन से प्रेरित मायापट जैसी।
और आवरण-मुक्त प्रकृति थी हरी-भरी फिर भी वैसी।
स्वर्ण शालियों की कलमें थीं दूर दूर तक फैल रहीं,
शरद-इंदिरा के मंदिर की मानो कोई गैल रही।

विश्व-कल्पना-सा ऊँचा वह सुख-शीतल-संतोष-निदान ,
और डूबती-सी अचला का अवलंबन, मणि-रल-निधान ।
अचल हिमालय का शोभनतम लता-कलित शुचि सानु-शरीर,
निद्रा में सुख-स्वप्न देखता जैसे पुलकित हुआ अधीर।
उमड़ रही जिसके चरणों में नीरवता की विमल विभूति,
शीतल झरनों की धाराएँ बिखरातीं जीवन-अनुभूति !
उस असीम नीले अंचल में देख किसी की मृदु मुसक्यान,
मानो हंसी हिमालय की है फूट चली करती कल गान।
शिला-संघियों में टकरा कर पवन भर रहा था गुंजार ,
उस दुर्भेद्य अचल दृढ़ता का करता चारण-सदृश प्रचार ।
संध्या-धनमाला की सुंदर ओढ़े रंग-बिरंगी छींट ,
गगन-चुंबिनी शैल-श्रेणियाँ पहने हुए तुषार-किरीट।
विश्व-मौन, गौरव, महत्त्व की प्रतिनिधियों से भरी विभा ,
इस अनंत प्रांगण में मानो जोड़ रही है मौन सभा।
वह अनंत नीलिमा व्योम की जड़ता-सी जो शांत रही,
दूर-दूर ऊँचे से ऊँचे निज अभाव में भ्रांत रही।
उसे दिखातीं जगती का सुख, हँसी, और उल्लास अजान ,
मानो तुंग-तरंग विश्व की हिमगिरि की वह सुढर उठान ।

थी अनंत की गोद सदृश जो विस्तृत गुहा वहाँ रमणीय,
उसमें मनु ने स्थान बनाया सुंदर, स्वच्छ और वरणीय ।
पहला संचित अग्नि जल रहा पास मलिन-द्युति रवि-कर से ,
शक्ति और जागरण-चिह्न-सा लगा धधकने अब फिर से।

कामयनी / 9