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जैसे असंख्य मुकलों का मादन-विकास कर आया।
उनके अछत अधरों का कितना चुंबन भर लाया।
रुक-रुक कर कुछ इठलाता जैसे कुछ हो वह भूला ,
नव कनक-कुसुम-रज धूसर मकरंद - जलद - सा फूला।
जैसे वनलक्ष्मी ने ही बिखराया हो केसर-रज ,
या हेमकूट हिम जल में अलकाता परछांई निज।
संसृति के मधुर मिलन के उच्छ्वास बना कर निज दल ,
चल पड़े गगन-आँगन में कुछ गाते अभिनव मंगल ।
वल्लरियाँ नृत्य निरत थीं, बिखरी सुगंध की लहरें ,
फिर वेणु रंध्र से उठ कर मूर्च्छना कहाँ अब ठहरे।
गूँजते मधुर नूपुर से मदमाते होकर मधुकर ,
वाणी की वीणा-ध्वनि-सी भर उठी शून्य में मिलकर।
उन्मद माधव मलयानिल दौड़े सब गिरते-पड़ते ,
परिमल से चली नहा कर काकली, सुमन थे झड़ते।
सिकुड़न कौशेय वसन की थी विश्न-सुंदरी तन पर ,
या मादन मृदुतम कंपन छायी संपूर्ण सृजन पर।
सुख-सहचर दुःख-विदूषक परिहास पूर्ण कर अभिनय ।
सब की विस्मृति के पट में छिपा बैठा था अब निर्भय।
थे डाल-डाल में मधुमय मृदु मुकुल बने झालर से ,
रस का भार , प्रफुल्ल सुमन सब धीरे-धीरे से बरसे।
हिम खंड रश्मि मंडित हो मणि-दीप प्रकाश दिखाता ,
जिनसे समीर टकरा कर अति मधुर मृदंग बजाता ।
संगीत मनोहर उठता मुरली बजती जीवन की ।
संकेत कामना बन कर बतलाती दिशा मिलन की ।
रश्मियाँ बनीं अप्सरियाँ अंतरिक्ष में नचती थीं ,
परिमल का कन-कन लेकर निज रंगमच रचती थीं।
मांसल-सी आज हुई थी हिमवती प्रकृति पाषाणी ।
उस लास-रास में विह्वल थी हँसती-सी कल्याणी।

कामायनी / 123