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अंक २, दृश्य ७
 


सुख लेता है, कोलाहल से भागता है, और कभी- कभी फल-फूलो से लदकर नोचा-खसोटा जाता है ।

संतोष-तुम कौन हो ?

करुणा-इसी अभागे देश की एक बालिका, जहाँ जीवन के साधारण सुख धन के आश्रय में पलते है, जिसका अभाव दरिद्रता है।

संतोष-दरिद्रता । कैसी विकट समस्या । देवी दरिद्रता सब पापो की जननी है, और लोभ उसकी सबसे बड़ी सन्तान है। उसका नाम न लो। देखो, अन्न के पके हुए खेतों में पवन के सर्राटे से लहर उठ रही है । दरिद्रता कैसी ? कपड़े के लिए कपास बिखरे है । अभाव किसका है ? सुख तो मान लेने की वस्तु है। कोमल गद्दों पर चाहे न मिले, परन्तु निर्जन मूक शिलाखंड से उसकी शत्रुता नहीं ।

करुणा-हाँ, वसन्त की भी शोभा है और पतझड़ मे भी एक श्री है। परंतु वह सुख के संगीत अब इस देश में कहा सुनाई पड़ते है, जिनसे वृक्षों मे- कुंजों में- हलचल हो जाती थी और पत्थरो में झनकार उटती थी। अब केवल एक क्षीण क्रन्दन उसके अट्टहास में बोलता है।

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