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देशमान्य श्री बाबू राजेन्द्रप्रसादजी, एम. ए., एम. एल लिखते हैं-मैं 'निर्माल्य' को प्राय आद्योपान्त पढ़ गया, और कुछ अंशो को तो एक बार से अधिक। हिन्दी कविता मे एक बड़ा परिवर्तन होता दीख रहा है, और आपका 'निर्माल्य' भी उस परिवर्तन मे सहायता पहुँचा रहा है। भाव और भाषा में सामंजम्य है। अनेक स्थानों पर भाव और भाषा दोनों का ही बड़ा उत्कर्ष है। आशा है, आपके द्वारा मातृभाषा के पुनीत चरणों पर ऐसे ही अलौकिक 'निर्माल्य' चढ़ते रहेंगे।

सुन्दर रेशमी जिल्द, रचयिता का सचित्र परिचय, मूल्य १)

४-महिला-महत्त्व

लेखक-श्रीशिवपूजनसहाय

'ब्राह्मण सर्वस्व' (होलिकांक) लिखता है-श्रीयुक्त बा॰ शिवपूजन सहायजी सरस एवं गद्यकाव्य के लक्षणों से समन्वित भाषा लिखने में सिद्धहस्त हैं, यद्यपि इसका आभास हम उनके सम्पादित मासिकपत्रों में ही पा चुके हैं, पर इस पुस्तक को देखने से यह भाव और भी पुष्ट हो गया है। इस पुस्तक में १० महत्त्वपूर्ण आख्यायिकायें हैं। इनकी सामग्री का संग्रह टाड साहब के राजस्थान से एवं जनश्रुत घटनाओं से किया गया है, पर भाषा और भाव आदि सभी लेखक के होने से इसको लेखक की मौलिक रचना कहना सर्वथा उपयुक्त है। इसकी भाषा सरसा, सालंकारा और सानुप्रासा है। इसमें संस्कृत गद्यकाव्य कादम्बरी की छटा दिखलाई पड़ती है। हिन्दी-उर्दू के वर्तमान और प्राचीन कवियों की कवितायें भी यत्रतत्र उद्धृत की गई हैं।