पृष्ठ:कांग्रेस-चरितावली.djvu/४५

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मस्टिस बदरुद्दीन तय्यब जी। R9 र्टर का चेहरा उतर गया और वह अपना सा मुंह लेकर वहां से खिसिया कर चला गया। बदरुद्दीन तय्यब जी ने दस वर्ष तक सिवाय चैरिस्टरी के काम के और कुछ रोज़गार नहीं किया। हम ऐसा ऊपर लिख चुके हैं। इतने दिनों तक आप ने घरायर अपने रोजगार की ओर ही ध्यान रक्खा। सर्व साधाण के हानि अथवा लाभ की ओर भाप ने बिलकुल ध्यान नहीं दिया। परन्तु सन् १८७८ में सरकार ने मंथिस्टर के माल पर कर माफ कर देने का विचार किया । ऐसा करने से बम्बई के व्यापारियों को बड़ा नुक्सान था। अतएव सयों ने मिल कर एक सभा की । उस सभा में यदरुद्दीन तय्यव जी ने जो व्याख्यान दिया यह बहुत ही मभाव शाली हुमा । इस से भाप की चारों ओर तारीफ़ होने लगी । परन्तु सरकार के ऊपर इन के व्याख्यान का कुछ भी असर न हुआ। सरकार को जो कुछ करना था वह उसने किया। परन्तु बदरुद्दीन तय्यब जी ने जो अपना कर्तव्य पालन किया वह विस्मरण करने योग्य नहीं है मजा का कहना न्याय दृष्टि से कहां तक ठीक है इस बात का विचार करना रागकर्ताओं का कर्तव्य है परन्तु विजातीय राजकर्ताओं के होने से वे अपने जातियांधों का नुक्सान करना किसी तरह से स्वीकार नहीं करना चाहते। फिर उनके सामने न्याय और युक्ति किस काम को ? फिर भला बदरुद्दीन तय्यब जी का व्याख्यान और पद भी भारत वासियों की भलाई के सम्बध में ? फिर वह कितना ही 'उत्तम, म्याय दृष्टि से परिपूरित और भारत की भलाई का हो उस की मोर कौन देखै ? और उसका परिणाम ही क्या ? इस बाबत अधिक कहने की पपा जरूरत । ऊपर फही हुई स्थिति में प्रजा का पक्ष लेकर कोई काम करना कितना कठिन है ? इस बात को वे ही लोग खूब जानते हैं जिनको प्रजा की भलाई का कुछ काम करना पड़ता है। प्रजा की बात को हम मानते है, मजा के मुख से हम सुखी हैं, इस प्रकार का विधान हम सरकारी राज दंडधारी पुरुष से लेकर छोटे से छोटे दरजे के सरकारी नौकर . ? 2.