पृष्ठ:कांग्रेस-चरितावली.djvu/३४

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१६ कांग्रेस-चरितावली। में यहा दुःख होगा। भाप के लेख का परिणाम बहुत ही अच्छा निकला । भारत के स्टेट सेक्रेटरी ने यह एक नामंजूर कर दिया । सन् १८७० आप ने “भारत फी प्रावश्यकताएं" सन् १८७१ में "भारत का व्यापार' और "भारत में वसूली की व्यवस्था इन विषयों पर लेख लिखकर प्रकाशित किए। इन लेखों के पढ़ने से, अंगरेज़ों को, भारत की राजनैतिक दशा का, बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ। सन् १९०३ में पार्लियामेंट की "सिलेक कमेटी के सामने, भारत सम्बन्धी कई एक बातों की गवाही देने के लिए श्राप को विलायत जाना पड़ा। परन्तु एक साल के बाद ही आप फिर भारत में लौट आए। उस समय बड़ोदा राज्य में राज-प्रबंध की बड़ी अव्यवस्था थी। स्वयं महाराज मल्हारराव गायकवाड़ राज्य का काम का चलाते थे। महाराज ने दादाभाई की बड़ी तारीफ़ मुनी । अतएव जा वें विलायत से सन् १८१४ में वापस आए तब महाराज ने आप को, बुल कर अपना दीवान बनाया। इससे पहले यहां किसी पारसी को, यह स्थान नहीं मिला था। इससे कई एक स्वार्थ-साधन-पटु और कुटिल राज सेवको को दादाभाई से डाह की जलन उप्तन्न हुई। जब दादाभाई के सत्य, और न्याय के प्रभाव से लोभी और खुशामदी लोगों की दाल न गली तम लोगों ने आप के विरुद्ध एक गुप्त व्यूह रखा। उन अधमाधम लोभी राज सेवकों के सामने दादाभाई की सत्यप्रियता, निस्पहता, स्पष्ट वक्तता, स्वदेश निष्ठा और आन्तरिक शुद्धता कुछ काम न आई ! आठ महीने के बाद ही पाप ने बडोदा राज्य के दीवानी के पद का त्याग कर दिया। आप बडोदे में बहुत दिनों तक न रहने पाए, तौमी आप ने वहां प्रजाहित के कई एक काम किए । सुनते हैं कि कल फेयर (जो उस समय बड़ोदा के रेज़िडेंट ये और जिन्हों ने महाराज और उनके दरवार की बहुत कुछ निन्दा पार्लियामेंट की "ठलूवुक" में प्रकाशित की थी ) के साथ दादाभाई का जो वादानुवाद हुआ था उस का यह परि हुआ साहब बहादुर रेजिडेंसी से निकाल दिए गए ! यदि आप यहां कुछ समय तक और घने रहते तो बड़ोदा की प्रजा के भाग्य खुत परन्तु यहां की प्रजा भाग्य में सुख पानायदाही न था। बड़ोदा से दीयान गिरी का पद त्याग कर मा अम्बई पाए । वहां सन १८७५ में, उन दुष्ट कि जाते