पृष्ठ:कांग्रेस-चरितावली.djvu/२१

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बाबू उमेशचन्द्र बनर्जी। ३ मूल धन से जो व्याज माता था उस से विद्यार्थियों की सहायता की जाती थी। हर साल भारत के पांच विद्यार्थियों को विलायत में जाकर कानूग पढ़ने के लिए वल्लीफ़ा दिया जाता था । उमेश यायू ने भी इस यज़ीफा पाने के लिए सरकार से प्रार्थना की। सरकार ने इनका उत्साह और साहस देख कर इन की परीक्षा लेने को एक सभा नियत की। सभा ने उन की परीक्षा लेकर उन्हे विलायत जाने और पढ़ने के योग्य बताया। तय सरकार ने भी इनको वज़ीफ़ा दिए जाने की मंजूरी दे दी। वज़ीफा पाकर उमेश यायू अक्तूबर सन् १८६४ में, विलायत गए । नीर यहां "मिडिल टेम्पल" नामक कानूनी मदरसे में जाकर भरती होगए । कानून को उन्हों ने खूय जी लगाकर पढ़ा । विलायत के मुख्य मुख्य कानूनी विद्वानों से मिलकर और उनके पास काम करके उमेश बाबू ने वहां कानून को अच्छी योग्यता प्राप्त की। उन्हों ने विलायत जाकर केवल कानून ही नहीं पढ़ा परन्तु देश हित के लिए भी वे यहां बहुत कुछ उद्योग करते रहे । उस समय दादा भाई नौराज़ी भी विलायत में ही थे। उन की सलाह से इन्हों ने सन् १८६५ में "लंदन इपिहयन सोसाइटी" नाम की एक सभा स्थापित की। वे इस सभा के मंत्री नियत हुए। थोड़े दिनों के याद यह सभा "ईस्ट इपिष्टयन असोसिएशन" में शामिल हो गई। इस सभा में उमेश बाबू ने २५ जोलाई सन् १८६५ में "भारतवर्ष की राज पद्धति कैसी होनी चाहिए" इस विषय पर एक बहुत ही उत्तम व्याख्यान दिया। इस व्याख्यान में उन्होंने इस बात पर अधिक ज़ोर दिया फि अंगरेजों को भारत का राज्य भारतवासियों की सम्मति से करना घाहिए। ऐसा करने से भारतवासियों को सुख मिलेगा और अंगरेजी; राज्य भी चिरस्थायी हो जायगा। सन् १८६८ ईस्वी में ये धारिस्टरी की परीक्षा पास कर के भारतवर्ष में लौट पाए। उसी साल इनके पिता गिरीशचन्द्र का देहान्त हुआ। भारतवर्ष में लौट पाने पर ये कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। पर ये पहले जो मुहमा सन्हों ने अपने हाथ में लिया यह एफ गरीय