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भाई की विदाई
 


भाई की विदाई कुछ भी न ले जा सके।

दारोगाजी की बांछे खिल गईं। परन्तु कमालुद्दीन चक्कर में थे। उन्होंने संकेत से दारोगाजी से कहा यहां तो कुछ दाल में काला नज़र आता है।

'यह क्या?'

'यह नामुमकिन है कि डाकू बिना कुछ लिए भाग गए हों?'

'हां, यह तो साफ है?'

'फिर लाला ऐसा क्यों कहता है?'

'यही तो पूछना चाहिए।'

दारोगाजी ने डपटकर कहा-ठीक रिपोर्ट लिखानो जी! कमालुद्दीन, ले जाओ, ज़रा लाला के होश ठीक कर दो-यहां ये घबरा रहे हैं।

कमालुद्दीन लाला को एक तरफ ले गया। कुछ क्षण में वातचीत समाप्त हो गई।

मुनासिब रिपोर्ट लिखकर दारोगाजी दल-बलसहित वहीं सो रहे। सुबह उनके लिए पूरियां तली गईं। खूब डाटकर मुट्ठी गर्म करके दारोगाजी ने थाने की राह ली।

रोज़नामचे में लिखा गया:

'खादिम खुद मौके पर चन्द बहादुर सिपाहियों को लेकर पहुंचा। डाकू ४० के करीब थे। सब हथियारबन्द। रात-भर गोली चलती रही। यहां तक कि मेरी और सिपाहियों की वर्दियां भी फट गईं और चोट भी आई। मगर चूंकि डाकू बहुत ज्यादा थे और सब हथियारों से लैस थे-वे भाग गए। मगर डाका न पड़ सका-और एक पाई का माल भी नहीं लूटा गया।

कहना नहीं होगा कि दारोगाजी की कारसाज़ी की खूब तारीफें की गईं।

वैशाख कृष्णा तेरस थी। कृष्णा का आज ही विवाह था। घर में धूम थी। बरात आ गई थी। ज्यों-ज्यों दिन ढल रहा था कृष्णा का उद्वेग बढ़ता जाता था। वह प्रतिक्षण देवीसिंह के आने की प्रतीक्षा में थी। संध्या हो गई। दिये जल गए। द्वार पर बाजे बज रहे थे। बरात भोजन कर रही थी, लोग दौड़-धूप कर रहे थे। कृष्णा अब भी उस आगन्तुक की प्रतीक्षा में थी।

एक दुबला-पतला युवक आया और इधर-उधर देख घर में घुस गया। उसका