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मास्टर साहब
 

गए।

'रात को भूखे ही सो रहे तुम, खाना नहीं खाया?'

'कहां, तुम काम में लगी थीं, मुझे पड़ते ही नींद आई तो फिर आंख ही नहीं खुली।'

'मैं तो पहले ही जानती थी कि बिना इस दासी के लाए तुम खा नहीं सकते रोज ही तो चाकरी बजाती हूं; एक दिन मैं तनिक अपनी मिलनेवालियों में फंस गई, सो रूठकर भूखे ही सो रहे। सो एक बार नहीं सौ बार सो रहो, यहां किसी की धौंस नहीं सहनेवाले हैं।'

'लेकिन प्रभा की मां, इसमें धौंस की क्या बात है? मुझे नींद आ ही गई।'

'आ गई तो अच्छा हुआ, अब महीने के खर्च का क्या होगा?'

'ट्यूशन ही के बीस रुपये जेब में पड़े हैं, उन्हींमें काम चलाना होगा।'

'ट्यूशन के बीस रुपये? वेतो रात काम में आ गए। मैंने ले लिए थे।'

'वे भी खर्च कर दिए?'

'बड़ा कसूर किया, अब फांसी चढ़ा दो।'

'नहीं, नहीं, प्रभा की मां, मेरा खयाल था चालीस रुपये में तुम काम चला लोगी, बीस बच रहेंगे। इनसे दब-भींचकर महीना कट जाएगा।'

'यह तो रोज़ का रोना है। तकदीर की बात है, यह घर मेरी ही फूटी तकदीर में लिखा था। पर क्या किया जाए, अपनी लाज तो ढकनी ही पड़ती है। लाख भूखे-नंगे हों, परायों के सामने तो नहीं रह सकते। वे सब बड़े घर की बहू-बेटियां थीं, कोई खटीक-चमारिन तो थी ही नहीं। फिर साठ-पचास रुपये की औकात ही क्या है?'

मास्टर साहब चिन्ता से सिर खुजाने लगे। उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा। महीने का खर्च चलेगा कैसे, यही चिन्ता उन्हें सता रही थी। अभी दूधवाला आएगा, धोबी आएगा। वे इस माह में जूता पहनना चाहते थे-बिलकुल काम लायक न रह गया था। परन्तु अब जूता तो एक ओर रहा, और आवश्यक खर्च की ही चिन्ता सवार हो गई।

पति को चुप देखकर भामा झटका देकर उठी। उसने कहा अब इस बार तो कसूर हो गया भई, पर अब किसीको नहीं बुलाऊंगी। इस अभागे घर में तो