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ग्यारहवीं मई
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वह सन् १८५७ की ग्यारहवीं मई का प्रभात था। मुगलों का प्रताप-सूर्य अस्त हो चला था, बादशाह बहादुरशाह बूढ़े और असहाय थे। उनकी बादशाहत सिर्फ लालकिले ही तक सीमित थी। बाकी तमाम मुल्क अंग्रेजी अमलदारी में आ गया था। बादशाह भावुक और सज्जन थे। दुहत्थे शासन की गड़बड़ी देश में चल रही थी। दिल्ली में भांति-भांति की अफवाहें फैल रहीं थीं, कुछ लोग कहते थे कि ग्यारहवीं मई को दिल्ली लूटी जाएगी! परन्तु अफसर सावधान न थे।

सात बजे सुबह हथियारबन्द सिपाहियों की एक टुकड़ी नावों के पुल को पार करके नगर में घुसी। उसने पहले पुल के ठेकेदार को मार डाला और उसका सब रुपया लूट लिया। इसके बाद उन्होंने पुल को तोड़ दिया। नगर कोतवाल खबर पाते ही अंग्रेज़ रेजीडेण्ट के पास गया। रेजीडेण्ट ने कोतवाल को तमाम कागज़ात शहर में ले जाने की आज्ञा दी और तुरन्त किले में आकर उसके सब फाटक बन्द करा दिए। उस समय किले में और भी कई अंग्रेज़ पुरुष और स्त्री थे।

थोड़ी देर बाद किसीने किले के लाहौरी दरवाजे पर आकर कहा:

'द्वार खोल दो।'

'तुम कौन हो?'

'मैं मेरठ के रिसाले का सवार हूं।'

'और लोग कहां हैं?'

'अंगूरी बाग में हैं।'

'उन्हें भी ले आओ।

सवार लौट गया और सूबेदार चुपचाप फाटक पर टहलने लगा। विद्रोही दल फाटक पर आ पहुंचा। और सूबेदार ने फाटक खोल दिया। विद्रोही दल तेजी से किले में घुस पड़ा। यह देख रेजीडेण्ट पीले पड़ गए। उन्होंने सूबेदार को आज्ञा दी कि फाटक की गारद के सिपाहियों को बन्दूक भरने की आज्ञा दो। सूबेदार ने गाली देकर कहा-भाग सूअर।-इसके बाद ही एक गोली ने रेजीडेण्ट का काम तमाम कर दिया। अब तो जहां जो अंग्रेज़ मिला कत्ल कर दिया गया। दरियागंज, जहां अंग्रेज़ लोग रहते थे, वहां के सभी मकानों में आग लगा दी गई। सारे शहर में लूट-मार और मार-काट मच गई। और दोपहर होते-होते शहर का वह भाग धांय-धांय जलने लगा।