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[चन्दन चतकुचन पर विलसत सुन्दर हार ।


सिरचुम्बी सुन्दर वसन बाहुमूल उघरार ॥


अगुरु लगाये देह में दूर्वा श्यामल रूप ।


शोभित सन्तत हो रही नारी गौड अनूप ॥]

उन देशों में जाकर काव्यपुरुष ने जैसी वेषभूषा धारण की वहाँ के पुरुषों ने भी उसी का अनुकरण किया। उन देशों में जैसी भाषा साहित्य-वधू बोलती गई वहाँ वैसी ही बोली बोली जाने लगी। उसी बोल चाल की रीति का नाम हुआ ‘गौडी रीति––जिसमें समास तथा अनुप्रास का प्रयोग अधिक होता है। वहाँ जो कुछ नृत्य गीतादिकला उन्होंने दिखलाई उसका नाम हुआ ‘भारतीवृत्ति’। वहाँ की प्रवृत्ति का नाम हुआ ‘रौद्रभारती ।’

वहाँ से सब लोग पाञ्चाल की ओर गये । जहाँ पाञ्चाल-शूरसेन- हस्तिनापुर-काश्मीर-वाहीक-वाह्लीक इत्यादि देश हैं । वहाँ जो वेशभूषा साहित्यवधू की थी उसका वर्णन ऋषियों ने यों किया––

ताटंकवल्गनतरंगितगण्डलेख--

मानाभिलम्बिदरदोलिततारहारम् ।

आश्रोणिगुल्फपरिमण्डलितोत्तरीयं

वेषं नमस्यत महोदयसुन्दरीणाम् ॥

[तडकी चञ्चल झूलती सुन्दरगोलकपोल ।।

नाभीलम्बित हार नित लिपटे वस्त्र अमोल ।]

इन देशों में जो नृत्यगीतादिकला साहित्यवधू ने दिखलाई उसका नाम ‘सात्वतोवृत्ति’ और वहाँ की बोलचाल का नाम हुआ ‘पांचाली रीति’ जिसमें समासों का प्रयोग कम होता है ।

वहाँ से अवन्ती गये । जिधर अवन्ती-वैदिश-सुराष्ट्र-मालव-अर्बुद- भृगुकच्छ इत्यादि देश हैं । वहाँ की वृत्ति का नाम हुआ ‘सात्वती-कैशिकी’। इस देश की वेशभूषा में पांचाल और दक्षिण देश इन दोनों का मिश्रण है । अर्थात् यहाँ की स्त्रियों की वेषभूषा दाक्षिणात्य स्त्रियों के समान——और

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