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सवैया ४१
 

हाथ गह्यो, ब्रजनाथ सुभावही, छूटिगई धुरि धीरजताई,
पान भखै मुख नैन रचोरुचि, आरसी देखि कह्यो हम ठाई।
दै परिरम्भन मोहन को मन, मोहि लियो सजनी सुखदाई,
लाल गुपाल कपोल नखक्षत, तेरे दिये ते महाछवि छाई॥४१॥

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दोहा २३
 

परम तरुणि यों शोभियत, परम ईश अरधङ्ग।
कल्पलता जैसी लसै, कल्प वृक्ष के सङ्ग॥

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सवैया १०
 

भोर जगी, वृषभानुसुता, अलसी बिलसी निशि कुंजबिहारी।
केशव पोंछति अंचलछोरनि, पीक सुलीक गई मिटिकारी॥
वंकलगे कुचबीच नखक्षत, देखि भई दृग दूनी लजारी।
मानौ वियोगबराह हन्यो युग, शैलको संधि मे इंगवैडारी॥

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कवित्त १०
 

दुरि है क्यो भूषन बसन दुति यौवन की,
देहि ही की जोति होति द्यौस ऐसी राति है।
नाह की सुवास लागै ह्वै हे कैसी "केशव",
सुभाव ही की वास भौरभीर फोरखाति है।
देखि तेरी मूरति की, सूरति बिसूरति हौ,
लालन को दृग देखिबे का ललचाति है।
चलिहैं, क्यों चन्द्रमुखी, कुचनि के भार भये,
कुचन के भार से लचकि लङ्क जाति है॥१०॥