लोक विरोधी दोष
स्थायी वीर सिंगार के, करुणा घृणा प्रमान।
तारा अरु मन्दोदरी, कहत सतीन समान॥५७॥
वीर और श्रृंगार के स्थायी के साथ करुणा तथा घृणा का वर्णन करना और तारा तथा मन्दोदरी को सती स्त्रियो के समान कहना लोक विरुद्ध है।
न्याय तथा आगमविरोधी दोष।
पूजौ तीनौ वर्ण जग, करि विप्रन सों भेद।
पुनि लीबो उपवीत हम, पढि लीजै सब वेद॥५८॥
ब्राह्मणो को छोड़कर तीनो वर्णो की पूजा करो। हम पहले वेद पढ़ले तब यज्ञोपवीत लेंगे। [ इन दोनो वाक्यो में पहले वाक्य में नीति-विरोध है और दूसरे में आगम या शास्त्र-विरोध है। ]
यहि विधि औरौ जानियहु, कविकुल सकल विरोध।
केशव कहे कछूक अव, मूढन के अविरोध॥५९॥}}
हे कवि लोगो! इस तरह विरोधी के और भी बहुत से भेद समझ लो। 'केशवदास' कहते है कि मैंने उनमे से कुछ ही ऐसे भेदो का वर्णन किया है जिनका मूढ़ भी विरोध न करेंगे।
केशव नीरस विरस अरु, दु:संधान विधानु।
पातर दुष्टादिकन को, 'रसिक प्रिया' ते जानु॥९०॥
'केशवदास' कहते है कि 'नीरस', 'विरस' 'दु सन्धान' और 'पात्र दुष्ट' आदि दोषो को 'रसिक प्रिया' ग्रन्थ से समझ लो।