पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/३३२

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
(३१४)

गूढ़ोत्तर

दोहा

उत्तर जाको अतिदुरयो, दीजै केशवदास।
गूढ़ोत्तर तासों कहत, बरणत बुद्धिविलास॥४७॥

'केशवदास' कहते है कि जहाँ प्रश्न का उत्तर छिपे हुए रूप मे दिया जाय, उसे बुद्धिमान लोग गूढ़ोत्तर अलंकार कहते हैं।

उदाहरण-१

सवैया

नखते शिखलौ सुखदैके सिंगारि सिंगार न केशव एक बच्यो।
पहिराइ मनोहर हार हिये पियगात समूह सुगन्ध सच्यो।
दरसाइ सिरी कर दर्पण लै कपिकुञ्जर ज्यों बहु नाच नच्यो।
सखि पान खवावतही किहिं कारण कोप पिया परनारि रच्यो॥४८॥

'केशवदास' कहते है कि नायक ने नखसे शिख तक अपनी नायिका का ऐसा श्रृंगार किया कि कोई श्रृंगार बाकी न बचा। फिर सुन्दर हार गले में पहना कर, शरीर में सब प्रकार की सुगन्ध लगाई। तब उसने एक दर्पण लेकर उसकी शोभा दिखलाई। परन्तु जब वह पान खिलाने लगा, तब तो उसने बड़े बन्दर की भाँति अनेक नाच नाचे अर्थात् बड़ी उछल कूद मचाई। यह देख एक सखी पूछने लगी कि 'बताओ तो सखी अपने नायक पर स्त्री क्यो क्रुद्ध हुई?' [इसका उत्तर---अंतिम चरण के 'पिया पर नारि रूच्यो' में छिपा हुआ है। अर्थात् उसने पान खिलाते समय ऐसे चिन्ह देखे जिससे उसे ज्ञात हो गया कि मेरा नायक पर स्त्री से सम्बन्ध रखता है इसी से वह