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[इसमें दूसरे तथा चौथे चरण के 'कमलाकर कमलाकर' पदो को मिलाकर यमक बनाता है।]

पूर्वोत्तर यमक

दोहा

परम तरुणि यों सोभियत, परम ईश अरधङ्ग।
कल्पलता जैसी लसै, कल्पवृक्ष के सङ्ग॥२३॥

परम तरुणी (श्री पार्वती जी) परमईश (श्री शङ्कर जी) के अर्धाङ्ग में इस प्रकार शोभित हो रही हैं, जिस प्रकार कोई श्वेत लता कल्पवृक्ष में लिपटी हो।

[इसमें पूर्व पदो में 'परम-परम' और उत्तर पदो में 'कल्प-कल्प' का यमक है]

त्रिपादादि यमक

दोहा

दान देत यों शोभियत, दान रतन के हाथ।
दान सहित यो राजही, मत्तगजनि के माथ॥२४॥

दान देते समय दान रत्नों अर्थात् श्रेष्ठ दानियो के हाथ इस प्रकार सुशोभित होते हैं जिस प्रकार मतवाले हाथियो के मस्तक दान (मंद) सहित सुशोभित होते हैं।

[इसमे 'दान' शब्द यमक है]

चतुष्पदादि यमक

दोहा

नरलोकहि राखत सदा, नरपति श्री रघुनाथ।
नरक निवारण नाम जग, नर बानर को नाथ॥२५॥