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प्रीतमको पट क्यो पलट्यो? अलि, केवल तेरी प्रतीति को ल्याई।
केशव नीकेहि नायक सों रमि नायका बात नही बहराई॥२७॥

मुँह पर हसीने को बूंदे और हृदय मे सम्बी उसासें क्यो है? इस लिए कि तेरे लिए दौड़ती हुई आई हूँ। तेरे मुख का राग सरलता से फीका कैसे पड़ गया? क्योकि तेरे पति ने मुझे अनेक बार बकवाया है। मेरे प्रियतम का वस्त्र तुझसे कैसे बदल गया? हे सखी इसे तो मै तेरे विश्वास के लिए लाई हूँ। 'केशवदास' कहते है इस तरह से उसके पति के साथ स्वंय रमण करके, बेचारी नायिका को बातो ही बातो में बहला दिया।

[इसमे जो सिद्धि नायिका को मिलनी चाहिए थी, वह उसकी सखी को मिल गई अतः अमित अलंकार है]

उदाहरण (२)

सवैया

को कनै कर्ण जगन्मणिसे नृप, साथ सबै दल राजनही को।
जानै को खान किते सुलतानसो, आयो शहाबुदी शाह दिलीको।
ओड़छे आति जुरयो कहि केशव, शाहि मधूकर सों शँक जीको।
दौरिकै दूलह राम सुजीति, करयो अपने शिर कीरति टीको॥२८॥

जगत्मणि कर्ण से राजाओ को कौन गिने? उसके साथ तो राजाओ का पूरा दल ही था। ज्ञात नहीं कितने खान और सुलतानो को साथ लेकर, दिल्ली का शहाबुद्दीन लड़ने आया था। 'केशवदास' कहते हैं कि जिससे राजा मधुकर शाह को अपने प्राणो की शंका थी वहाँ शहाबुद्दीन ओछड़े पर आकर डट गया। यह सुनते ही दूलहराम ने दौड़कर उसे जीत कर अपने सिर कीर्ति का टीका ले लिया।