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केवल माता को आरती उतारते देख पुत्र (भरत जी) का दुख बढ़ गया।

(इसने 'शोक' स्थायी भाव है अत. करुणा रसवत अलङ्कार है)

भयानक रसवत

उदाहरण (१)

सवैया

रामकी बाम जु ल्याये चुराय, सु लक मे मीचुकी बेलि बईजू।
क्यो रणजीतहुगे तिनसो, जिनकी धनुरेख न नांघी गईजू॥
बीसबिसे बलवन्तहुते जो, हुती दृग केशव रूप रईजू।
तोरि शरासन शंकर को प्रिय, सीय स्वयम्बर क्यों न लईजू॥५८॥

(मन्दोदरी रावण से कहती है कि) तुम जो श्रीरामचन्द्र की भार्या को चुरा लाये, सो तुमने मानो लड़्का मे मृत्यु की बेल बो दी। उनसे तुम युद्ध मे कैसे जीतोगे, जबकि उनके धनुष से खींची हुई रेखा को तुम न लाघ सके? (केशवदास-मन्दोरी की ओर से कहते हैं कि) यदि तुम बीसो विश्वा (पूर्ण रूप से) बलवान थे तो, जो सीता तुम्हारी दृष्टि मे रूपमयी ज्ञात होती थी, उसे श्री शङ्कर जी का धनुष तोड़कर, स्वयम्बर के समय, क्यो न ले लिया?

(यहाँ मन्दोदरी के मन मे 'भय' उत्पन्न हुआ ज्ञात होता है अत वही स्थायी भाव है और इसीलिए यह भयानक रसवत अलङ्कार है)

उदाहरण (२)

सवैया

बालि बली न बच्यो पर खोरि, सु क्यों बचिहौ तुमकै निज खोरहि।
केशव क्षीर समुद्र मथ्यो कहि, कैसे न बांधि है सागर थोरहि॥