पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१५४

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
( १३९ )

से अधरो का खडन होता है) तव (नायक मे निर्दयता आजाती है और) वह कृपा नहीं दिखाता परन्तु साथ ही भरसक मान की रक्षा भी करता जाता है। तब (कुच) भली-भाँति नखो का प्रहार सहते है। ऐसे समय सुन्दर हार आदि भूषण, दूषण (दोष युक्त या बुरे) प्रतीत होने लगते है। (क्योकि आलिंगन में अडचन डालते हैं)। हे सखी! यह सुरति की रीत अच्छी होती है। इसी समय किसी बाहरी सखी ने पूछा---क्या सुरति का वर्णन कर रही हो?' उसने उत्तर दिया---'नहीं सखी! समर या युद्ध का वर्णन कर रही हू।' देखो---

युद्ध मे पहले तो भीरु लोग भय खाते है अर्थात् डर कर भाग जाते है फिर शूरो की रोष रुचि जागृत होती है जिससे क्रोध की गर्मी से उन्हे पसीना आ जाता है परन्तु वे काँपते नहीं। वे लोग अपने न्यारे प्राणो की बाजी लगा देते है। हाथी तथा पैदल सिपाही चलते दिखाई पडते है और तरह तरह के (उत्साहवर्द्धक) शब्द होने लगते है और पक्षी (गिद्ध आदि) माँस का दान पाते है। हाथो मे सुन्दर कृपाण (तलवार) रहती है जो मान की रक्षा कर सकती है। वीर लोग सज सजकर शत्रुओ के) हाथो के प्रहार सहते है। उस समय वीर लोग, स्वदेश को ही भूषण समझते है और हार अर्थात् पराजय को बडा भारी दूषण मानते है। (समर का वर्णन करते समय) हे सखी! लोग इन्हीं बातो का वर्णन करते है।