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बिध के से बांधव, कलिदनंद से अमंद,
बंदन कै सूड भरे, चन्दन की चारु खौरि।
सूर के उदोत, उदै गिरि से उदित अति,
ऐसे गज राज राजै राजा रामचन्द्र पौरि॥२८॥

राजा रामचन्द्र जी की पौर ( दरवाजे ) पर ऐसे हाथी सुशोभित हो रहे है जो जल के पगार अर्थात् गहरे पानी को पैदल ही पार करने वाले, अपने दल की शोभा और बैरियो के दल को बिगाड़ कर उनके नगरो मे कोलाहल मचा देनेवाले है। वे दुर्गो को ढहा देने वाले है बादल जैसे ( काले ) है, युद्ध मे योद्धाओ की भाँति लड़ते है और जिन्हे गणेशजी के धोखे मे, पार्वती जी आर्शीवाद दिया करती है। जो विन्ध्याचल पहाड जैसे ( ऊँचे ) है कलिन्द पहाड़ के पुत्र जैसे ( काले-काले ) है, सुन्दर है, जिनकी सूडे़ बदन ( सिन्दूर ) से रंगी हुई है। जिनके चन्दन की सुन्दर खौरे लगाई गई है और जो सूर्योदय के समय उदयाचल जैसे अति सुन्दर प्रतीत होते है।

संग्राम वर्णन

दोहा

सेना स्वन, सनाह, रज, साहस, शस्त्रप्रहार।
अंग-भंग, संघट्ट भट, अधकबन्ध अपार॥२९॥
केशव बरणहु युद्ध मे, योगिनगणयुत रुद्र।
भूमि भयानक रुधिरमय सरवर सरित समुद्र॥३०॥

'केशव' कहते है संग्राम का वर्णन करते समय सेना, कोलाहल,

कवच, ( उड़ती हुई ) धूल, साहस, शस्त्रो का प्रहार, अङ्ग-भङ्ग, योद्धाओ का समूह, अन्धकार, सिर कटे हुए धड़, योगिनियो के साथ रुद्र और रुधिरमय भयानक भूमि-आदि को तालाब, नदी, तथा समुद्र का रूपक देते हुए वर्णन करो।