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कविबचनसुधा।

ये सब मेरी कही शिवसागर तादिना ते तुम सांचु कै जानिहो । नेह सो देह दहेगी जब तबै प्यारे पराई व्यया पहिचानिहीं ॥

सोरठा।

प्रीति स ऐसी जान, काँटे की सी तौल है।

तिलभरि चढ़े गुमान, तौ मन सूई डग-मगै ॥

दोहा ।

चढि के मन तुरङ्ग पर चलिबो पावक माहिं ।

प्रेम पन्थ ऐमो कठिन सत्र सों निवहत नाहिं ॥

झूलना रामसहाय के-अलिफ ।

वह अलिफ इलाही एक है जी वहु भेष में आपु समाय रहा। कहि डोल्ता है कहिं बोल्ता है कहि सुन्ता है कहिं गाय रहा । नहिं और किसी से कहताहूं मै अपना मन समुझाय रहा । गुरु इश्क इसारा साहि दलै वाहिद में रामसहाय रहा ॥ १ ॥

वह अलिफ इलाही एक है जी जिन टेक धरी सोड़ पार पड़ा। कसि कमर करेजा हाथ लिया मैदान इश्क में आनि अड़ा ॥ यह भेद समुझि कर मूली पर मन्सूर भी तूर बनाय चड़ा । हद बेहद रामसहाय नही मिरहद में नेह निसान गडा ॥ २ ॥

वह अलिफ इलाही एक है जी जिसे सेख बिरहि मन ध्यावता है। कोई माला तसवी जपता हे दै बांग कोई गुण गावता है ॥ कोई जाय मनमारि मुराकिबे में कोई सून्य समाधि लगावता है । हर हाल में रामसहाय वही इक रामरूप दरसावता है ॥ ३ ॥