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कविवचनसुधा।

सवैया।

ए करतार बिनै सुनि दास की लोकन के अवतार करो जनि। लोकन के अवतार करो जो तो मानुषही को सवाँर करो जनि ॥ मानुषही को सवाँर करो तो तिन्हैं विच प्रेम प्रचार करो जनि । प्रेम प्रचार करो तो दयानिधि केई बियोग बिचार करो जनि ॥ गिरि सों गिरिबो मरिबो बिष सोनिज हाथ सों काटिबो नीको गरे को पावक में जरिबो है भलो परिबो भलो सिन्धु में जन्म भरे को ।। त्यागियो है सुरलोक को नीको सु आर सही दुख नेक परे को । होत कलेस न जो इतने में सु होत बिदेसी सों प्रीति करे को।

कबित्त ।

तुमही बिचारो निरधारो प्रेम-पन्थन में भारी भारी ग्रन्थन में कैसी निप्सरत है । कहां आवै कहां जांय कासो कहै कौन सुनै मनसा बिकल याही मांझ मिसरत है ।। ठाकुर कहत चित्त चलन ललन प्यारे न्यारे हे सिधारे या निराली कसरत है । जासों मन लागो नैन लागे लगी प्रीति पूरी ताकी कहूं सूरति बिसारे बिसरति है ? ॥ १८ ॥

मधुर मधुर मुख मुरली बजाय धुनि धमाके धमारन की धाम धाम कै गयो । कहै पदमाकर त्यों अगर अबीरन को करि के घलाधली छलाछली चितै गयो । को है वह ग्वाल जो गुवालन के सङ्ग में अनङ्ग छबि वारो रसरङ्ग मे मिजै गयो । बै गयो सनेह फिरि छ गयो छरा को छोर फगुआ न दै गयो हमारो मन लै गयो॥ १९ ॥