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कविवचनसुघा ।


दबानो मारिनिधि की जिमी सी सिफी आसमान शस्त दिशानधन घोर घहराती है। मदनं नरेश जू को चमू चढ़ि तुङ्ग तुङ्ग चुमैं धरि क्षत्रिन की छटा छहराती है ।। मोहन भनत नील गिरि की गिरा सो चारु बनी हेम पच्छ स्वच्छ महत् कहराती है। माती है मतङ्गन ते उमड़ि उमड़ाती आज तरप अटा सों घटा घिसि घिसि जाती है ।। १९ ।।

पिय पैये तो बोध बतये घने जेहि पैये जो औध अतीब कहां। ये कलंकिनि कोयल काहिहैं वैर बुरो बिधु जीव छपीव कहां ॥ उपमान कहाय है हाय किते मुरछाय कह्यो घरी तीन महां । अहो नाह मै काह कहोगी तबै पुछिहै पपिहा जबै पीव कहां ॥ २०॥

दोहा प्रेमसागर ।

बिधि हरिहर जाको सदा जपत रहत हैं नाम ।

बसो निरन्तर मो हिये सिया सहित सो राम ॥ २१ ॥

मन चाहत सब दिन रहौं तव ढिग ये प्रिय नात ।

काह करों कछु बस नहीं परालब्ध की बात ॥ २२ ॥

तव बिछुरत क्षण में मरों काह जियो बिन तोहिं ।

तव मूरति उर में बसी वहै जियावत मोहिं ॥ २३ ॥

गनप गिरा गुरु गौरिपति सीतापति-पद ध्याय ।

बरणत राधाबर-चरित रसिक जनन सिर नाय ॥ २४ ॥

कवित्त।

गनपाले हालचाल बिमल बिसाल बानि राजत अमल तल