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कविबचनसुधा।


मति साई की। पारवती जानकी के मंगल ललित गाय राम रम्य अज्ञा रची काम धेनु नाई की ॥ दोहा औ कवित्त गीत बद्ध कृष्ण कथा कही रामायन बिनै मांह बात सब ठाई की । जग में सुहानी जगदीशहूं के मन मानी सन्त-सुखदानी बानी तुलसी गोसाई की ।। ७२ ॥

अधर मधुर लाल लाल अरविन्द भाल लाल सिर पाग पेंच खैचि मन लसिगो । मेहँदी करन लाल जावक रसाल पद कंज मंजु लाल लखि भली भांति गसिगो ॥ लोक लाज कुल काज साज औ समान सब लाल मुखचन्द हेरि अनायास नसि गो । युगुल अनन्य और सूमि न परत कछू ललित ललाई लाल लोचननि बसिगो ।। ७३ ।।

सवैया।

फागुन माह भरो उत्साह सु चाह हजारन होत हमेसे ।

गावती गीत सुप्रीति पगी ललना गन डारती रंग रंगे से ।।

लाड़िली लाल गुलाल अबीर लिये पिचका कर कन सुदेसे ।

युग्म अनन्य उमग सताप भिनाय के भीजि रहे बर बेसे ॥७४॥

कवित्त ।

क्रीट कमनीय पंच खड चंड कर द्युति दाम को दबाय देत लेत मन मोल है । हीरन जड़ित महामणिन खचित चारु रचित मनोज चोन सहित अतोल है ॥ बानक बिलोकि सुधि बुधि गति रोकि जात झलक लखत चहूंओर चित लोल हे । युगल