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कला और आधुनिक प्रवृत्तियाँ

नहीं जान पड़ेगी। तीसरा ढंग――वत्त को समवर्ग में इस तरह रखा जाय कि न वह मध्य में ही हो, न बिलकुल कोने में ही बल्कि समवर्ग की चारों भुजाओं से उसका सम्बन्ध भिन्न-भिन्न हो। यह सम्बन्ध चित्र में औरों से अधिक रुचिकर प्रतीत होता है।

वस्तुओं में रुचिकर सम्बन्ध

जब चित्र में एक से अधिक वस्तुओं को चित्रित करना हो तो यह आवश्यक नहीं है कि सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न या दूर-दूर दिखाई जायँ। जिन चित्रों में इस बात का ध्यान नहीं रहता उनमें दृष्टि को विविध वस्तुओं को अलग-अलग देखना पड़ता है और देखनेवाला एक ही साथ पूरे चित्र का आनन्द नहीं उठा पाता, जो बहुत ही आवश्यक है। इस तरह चित्र की एकता नष्ट हो जाती है और विविध वस्तुएँ विविध मन पर विविध प्रभाव डाल कर चित्त को एकाग्रता और शांति तो नहीं देतीं, प्रत्युत अशान्ति उत्पन्न करती हैं।

कभी-कभी एक वस्तु का केवल एक भाग ही चित्र में दिखाया जाता है, शेष चित्र की परिधि से कटा रहता है-जैसे पेड़ की डाल, उस पर चिड़िया और बगल में चन्द्रमा। कभी एक वस्तु का कुछ भाग दूसरी वस्तु के पीछे भी पड़ जाता है जैसे चौका और बेलन। दोनों ही परिस्थितियों में यह ध्यान रखना चाहिए कि वस्तुएँ एक दूसरे से ऐसी न दब जायँ कि पहचानी न जा सकें। जब किसी वस्तु का कोई अंग चित्र के बाहर कट गया हो तो भीतरवाला अंग दृष्टि को मुख्य विषय की ओर इंगित करता है। इससे चित्र और भी रुचिकर हो जाता है और मुख्य विषय की प्रधानता बढ़ जाती है, जैसे――पेड़ की डाल और चिड़िया के चित्र में। अगर पूरा पेड़ दिखाया जाय तो चिड़िया इतनी छोटी हो जाती है कि मुख्य विषय गौण हो जाता है।

कभी-कभी चित्र में जब दो वस्तुओं को अलग-अलग दिखाना अनिवार्य हो जाता है ऐसी स्थिति में उसे किसी दूसरी वस्तु से इस प्रकार जोड़ देना चाहिए कि चित्र की एकता नष्ट न हो। जैसे ‘मुसाफिर’ और ‘पगडंडी’ के चित्र में।

प्राकृतियों का संयोजन

जब एक से अधिक प्राकृतियों का संयोजन करना हो तो इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि वे सब एक ही स्थिति में एक ही ढंग से न रखी जायें, चाहे वे सब एक ही कार्य कर रही हों। हाँ, यदि कहीं सैनिक एक साथ संचरण कर रहे हों या कुछ स्त्रियाँ एक साथ कतार में नाच रही हों तब तो उन्हें एक स्थिति में दिखाना ही पड़ेगा, यद्यपि