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चित्रकला

चित्रकला क्या है, इसे समझने के पूर्व हमें यह समझ लेना चाहिए कि कला क्या है? जितने मुख उतनी ही परिभाषाएँ कला की हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें सर्वग्राह्य कौन-सी है। कला क्या है, इसे समझने के लिए हमें कला और प्रकृति का वैषम्य समझने की आवश्यकता है। कला और प्रकृति ये दोनों पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। जो कला है वह प्रकृति नहीं और जो प्रकृति है वह कला नहीं, केवल यही भली-भाँति समझ लेना ही कला का अर्थ समझ लेना है।

ईश्वर प्रकृति को रचता है और मनुष्य कला को उरेहता है, अतः मनुष्य जो कुछ भी रचता है वह कला की वस्तु कहलाती है, जैसे-मूर्ति, संगीत, काव्य, चित्र, नृत्य, भवन, मोटर या विस्फोटक बम आदि। परन्तु विस्फोटक बम या भवन बनानेवाले को हम कला-कार नहीं कह सकते। उन्हें हम इंजीनियर या वैज्ञानिक इत्यादि कहते हैं। निस्सन्देह सब एक से एक बड़े कलाकार हैं, क्योंकि यह सभी रचना का कार्य है। मनुष्य की रचना है इसलिए यह कला है। इस तरह तो प्रत्येक मनुष्य, अध्यापक, वकील, बढ़ई, लोहार, डाक्टर, किसान, माली या संसार का कोई भी काम करनेवाला कुछ न कुछ रचना करता है और इसीलिए उसकी रचना कला है और वह भी कलाकार है। इस तरह मनुष्य की किसी भी रचना को हम कला कह सकते हैं।

मनुष्य की सभी रचनाएँ प्रायः तीन मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों में हुआ करती है, चेतन, अर्धचेतन तथा अचेतन। मनुष्य की चेतन रचनाएँ उत्तम कोटि की रचनाएँ समझी जाती है। अर्धचेतन या अचेतन की रचनाएँ भी कला है, पर उनके लिए मनुष्य पूर्ण उत्तरदायी नहीं होता, इसलिए कला की दृष्टि में उनका अधिक ऊँचा स्थान नहीं है। मान लीजिए मरुस्थल में एक पथिक पदचिह्न बनाता चला जा रहा है, यात्रान्त दूर की किसी ऊँचाई से कोई इन पदचिह्नों को देखता है जो कि देखने में बहुत सुन्दर लगते हैं। पर इन चिह्नों को यदि पथिक ने अनजाने में बनाया है तो उसके लिए वह पूर्ण उत्तरदायी नहीं। इसलिए यह उस मनुष्य की सर्वोत्तम कला नहीं कही जा सकती। पर यदि एक मनुष्य इसी भांति