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कला और आधुनिक प्रवृत्तियाँ

कहना कठिन है। आनन्द और सौन्दर्य एक ही वस्तु नहीं। सौन्दर्य की प्राप्ति पर आनन्द का अनुभव हो सकता है। सौन्दर्य माध्यम है, लक्ष्य है आनन्द। बालक आनन्दित रहता है इसका यह तात्पर्य नहीं कि उसे सौन्दर्य भी प्राप्त है। आनन्द सन्तुष्टि से भी प्राप्त हो सकता है। सन्तुष्टि प्राप्त करने के अनेकों साधन है—सौन्दर्य भी एक है। बालक मा का दूध पी कर सन्तुष्ट हो आनन्दानुभूति करता है, सौन्दर्य की प्राप्ति से नहीं।

सौन्दर्य वस्तु में होता है। तुरन्त उत्पन्न हुआ बालक संसार की किसी वस्तु को नहीं पहचानता इसलिए उसे सौन्दर्य की अनुभूति नहीं हो सकती। जैसे-जैसे वह सांसारिक वस्तुओं से परिचित कराया जाता है, वह उन्हें पहचानना आरम्भ करता है और आरम्भ में वह केवल इतना ही समझता है कि कौन-कौन-सी वस्तु उसे सुख देती है, कौन दुःख। इस समय तक वह वस्तुओं की सुन्दरता पर कोई ध्यान नहीं देता। धीरे-धीरे उसकी रुचि अपने अनुभव के अनुसार बनती जाती है। जिन वस्तुओं से वह सुख पाता है, वे उसके लिए रुचिकर बनती जाती है। इस प्रकार सुख और दुःख के आधार पर उसकी रुचि बनती है। जो वस्तुएँ उसे सुख देती हैं उन्हें वह याद रखता है। याद रखने के लिए उसे वस्तुओं का आकार, रूप, रंग सभी निहारना पड़ता है और इन्हीं का एक चित्र उसके मस्तिष्क में खिंचता जाता है, जो स्थायी होता जाता है। इसके पश्चात् जब वह धीरे-धीरे अन्य वस्तुओं को भी पहचानने का प्रयत्न करता है और उसके सम्मुख तमाम वस्तुएँ आती जाती है तब उसे वस्तुओं के रूप को और बारीकी से समझना होता है, और एक दूसरे के रूप का अन्तर समझना होता है। गेंद भी गोल है, अमरूद भी गोल है, सन्तरा भी गोल है, चाँद, सूर्य, दुनिया की तमाम वस्तुएँ गोल है—इनके अन्तर को उसको समझना और याद रखना होता है। इस प्रकार बालक धीरे-धीरे रूप, आकार, रंग तथा उनकी प्रकृति को ध्यान से समझता जाता है और उनके अन्तर को याद रखकर वस्तुओं को पहचानता जाता है। यही ज्ञान आगे चलकर सौन्दर्य अनुभूति में परिणत हो जाता है। सौन्दर्य क्या है, यह ज्ञान जन्मजात नहीं है बल्कि इसे धीरे-धीरे वह समाज से तथा अपने अनुभव से सीखता है।

वस्तुओं का आकार, विलक्षणता, रूप तथा रंग बालकों को जल्द आकर्षित करते हैं। बहुत-सी वस्तुओं के बारे में बालक को कुछ भी ज्ञात नहीं रहता, परन्तु फिर भी उस वस्तु के विलक्षण रूप, रंग तथा आकार के कारण वह उसे भी पहचानता है और आकर्षित होता है, जैसे चाँद। चाँद को बालक नील आकाश में ऊपर एक विलक्षण चमकते गोले के रूप में देखता है—ऐसी दूसरी वस्तु उसे नहीं दिखाई देती। इस विलक्षणता के कारण धीरे-धीरे वह इसे पहचानने लगता है, यद्यपि वह क्या है, किस उपयोग का है कुछ नहीं जानता। इस प्रकार हम देखते हैं कि विलक्षण वस्तु या विचित्रता भी हमारा एक आकर्षण बन जाती