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कला और आधुनिक प्रवृत्तियाँ

रहने के कारण सचमुच हमारे समाज के मुखपर एक कालिमा लग गयी है और यह हमारा परम कर्तव्य है कि उसे धोकर साफ कर डालें, तब आगे बढ़ने का प्रयत्न करें । इस दिशा में स्वतंत्रता प्राप्त करना हमारा पहला कदम था । भौगोलिक दृष्टि से आज हम स्वतंत्र हैं,परन्तु सामाजिक दृष्टि से अब भी हम परतंत्र हैं । आज भी हमारे समाज का वही रूप है जो अंग्रेजी आधिपत्य के समय था । अब भी हम उनकी भाषा बोलते हैं, उन्हीं के वस्त्र पहनते हैं और अपना वेश बनाये हुए हैं । हम आज भी उनकी नकल करने को तत्पर हैं । इस दृष्टिकोण से भारत को अभी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई । जब तक हमारा समाज अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाता, अपने को पहचान नहीं पाता तब तक वह गुलाम ही कहलायेगा और हमारी आँख पर पड़े इस पर्दे को यदि आज का कलाकार, साहित्यकार या वैज्ञानिक हटा नहीं सकता तो वह अपने कर्तव्य से विमुख होता है ।

कला की अनेकों परिभाषाएँ बनीं और बिगड़ी, परन्तु कोई निश्चित परिभाषा आज भी दृष्टि में नहीं आती । सबसे सरल, सटीक परिभाषा जो आधुनिक युग में ठहरी है, वह कला को संयोजन से संबोधित करती है । किन्हीं दो या उनसे अधिक वस्तुओं के संयोजन को कला कहते हैं । संभव है, बहुत से विचारक आज भी इसे स्वीकार न करें, पर यह तो उन्हें स्वीकार करना ही पड़ेगा कि संयोजन का कार्य सभी कलाओं में निहित है । संयोजन पर सभी कलाएँ आधारित हैं । काव्य में शब्दों का संयोजन, संगीत में स्वरों का संयोजन, नृत्य में मुद्राओं का संयोजन, और उसी भाँति चित्रकला में रूप का संयोजन होता है । संयोजन के बिना कला हो ही नहीं सकती। परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि बिना कला के संयोजन नहीं हो सकता । संयोजन पहले है, फिर उसे हम कला भले ही कह लें। इसलिए यदि कला को संयोजन कहा जाय तो अनुचित न होगा ।

केवल ललित कलाओं में ही नहीं और दूसरी कलाओं में भी संयोजन के बिना कार्य नहीं हो सकता । मनुष्य की प्रत्येक क्रिया में संयोजन होता है । भोजन तैयार करने में उसको तमाम सामग्रियों का संयोजन करना पड़ता है । भोजन करने में भी उसे हाथ और मुख का संयोजन करना होता है । उठना, बैठना, बोलना, चलना, फिरना, मोचना, पढ़ना-लिखना, कल्पना करना, सभी में संयोजन होना आवश्यक है । यहाँ यह जान लेना अनुचित न होगा कि संयोजन को प्रबन्ध भी कहते हैं और प्रबन्ध हर कार्य में होता है । नक्षत्र, नदी, पहाड़, मैदान का प्रबन्ध, पेड़, पत्ती, जीव-जन्तु, प्रत्येक वस्तु, पूरी सृष्टि प्रबन्धित है । सृष्टि की प्रत्येक वस्तु अपना प्रबन्ध करती है । अपनी भूख मिटाने के लिए जंगली जानवर शिकार करते हैं, उनका एक भिन्न ढंग होता है । वे जानवर गुफाएँ खोदकर रहने का प्रबन्ध करते