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आध्यात्मिक प्रवृत्ति

बाजार में बिखरे पड़े हैं। आलोचकों को चाहिए कि पाश्चात्य विचारों को भी प्रस्तुत करते हुए अपना दृष्टिकोण सामने रखें।

यह बड़े खेद का विषय है कि यद्यपि पश्चिम में आधुनिक कला-मर्मज्ञ आज सचाई के साथ यह मानने को तैयार हैं कि आधुनिक कला का प्रेरणासूत्र भारतीय तथा अन्य पूर्वीय कला है, परन्तु हमारे नये कला-समीक्षक अब भी पश्चिम को ही कला-गुरु मानने को कटिबद्ध हैं। विद्वान् पाश्चात्य आधुनिक कला-आलोचक श्री शेल्डन चेनी की धारणा उनके ही मुख से उनकी विख्यात पुस्तक "एक्सप्रेशनिज्म इन आर्ट्स" से सुनिए, जो १९४८ ई० में प्रकाशित हुई है—

"आत्म अभिव्यंजनात्मक कला (एक्सप्रेशनिज्म) के प्रादुर्भाव के ही साथ पश्चिम ने पूर्व की उत्तम अलंकरण सिद्धि को मान्यता देना प्रारम्भ किया, चाहे वह चीन की गहराई वाले चित्र हों या फारसी, हिन्दू या जापानी कला।" पोस्ट इम्प्रेश्निज्म तथा फाविज्म के इतिहासकार इस बात को भुला सकते हैं कि सन् १८७० तथा १९०० के बीच इस पर पूर्वीय प्रभाव कितना पड़ा। बहुत-सी पूर्वीय निधियाँ जो यहाँ पायीं वही एक्सप्रेश्निज्म शैली का प्रारम्भिक प्रेरणासूत्र है जो बड़ी सरलता से खोजा जा सकता है। फ्रांसीसी कलाकार पाल गोगाँ के बारे में जिससे आधुनिक कला एक निश्चित धरातल पर पहुँचती है और जो पूर्वीय कला से प्रेरणा लेता था, लिखते हुए शेल्डन चेनी कहते हैं—

"और इसमें कोई लाभ नहीं कि आधुनिक कला का प्रेरणा-सूत्र इधर-उधर खोजा जाय। गोंगाँ की कला पूर्वीय कला के साथ है।"

"पूर्वीय कला में पाश्चात्य विचारों के आक्रमण से पहले कला का मूल तत्त्व ही सूक्ष्म स्वरूपों का मूल्यांकन था। बाइजनटाइन कला का प्रभाव जब पश्चिमी कला पर सरलता से पड़ रहा था तो पश्चिमी कला इन मूल्यांकनों से समृद्धशाली हो रही थी और उसका रूप सियानीज़, गिअटो तथा अन्य मूर्तिकारों की कला में दर्शनीय है। लेकिन रिनेसाँ के आरम्भ होते ही, यूरोप ने पूर्व से नाता तोड़ दिया। पश्चिमी कलाकारों ने बाह्य आडम्बर को ही महत्त्व देना प्रारम्भ किया जिसका सिलसिला इम्प्रेश्निज्म तक रहा। यथार्थवाद के आधिपत्य के समय सूक्ष्म आदर्शों का एक प्रकार से अन्त हो गया। 'एक्सप्रेश्निज्म' से पुनः रचनात्मक तत्त्व का आदर्श पश्चिम में प्रारम्भ हो गया है। आज पुनः पूर्वी प्रभाव का आगमन हो गया है और उसका असर पड़ रहा है क्योंकि हमने पूर्वी देशों से आत्मीयता जोड़ना आरम्भ कर दिया है।" इसी प्रकार अन्य पाश्चात्य विद्वान् भी आज किसी न किसी रूप में भारतवर्ष तथा अन्य पूर्वीय देशों की कला को ही आधुनिक कला का मूलस्रोत मानते हैं।