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कला और माधुनिक प्रवृत्तियों

की मांग है और चित्रकार वह माँग पूरी कर रहे हैं । परन्तु आधुनिक नवयुवक चित्रकारों की आँखों में आधुनिक यूरोपीय चित्रकला ने चकाचौंध कर दिया है, जिससे प्रभावित होकर वे भी प्रतीकात्मक तथा लाक्षणिक चित्रकला की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इसी को कहते हैं "द्राविड प्राणायाम" अर्थात् सीधे नाक न पकड़कर उलटे नाक पकड़ना। आधु- निक भारतीय चित्रकार परम्परागत प्राचीन भारतीय प्रतीकात्मक तथा लाक्षणिक चित्र- कला की अोर न जाकर, जो महासागर के सदृश हमारे देश में भरी पड़ी है, वे अनुकरण- वृत्ति के कारण यूरोप की प्रतीकात्मक तथा आत्म-अभिव्यंजनात्मक चित्रकला से अधिक प्रभावित हो रहे हैं, सागर छोड़कर गागर की तरफ दौड़ रहे हैं । यूरोप तो कला के क्षेत्र में, अपने को दिवालिया पाकर भारत तथा अन्य पूर्वी देशों की कला का आधार ले रहा है और यहाँ हम प्रेरणा के लिए उलटे उसका अनुकरण कर रहे हैं !

आधुनिक भारतीय कलाकारों में बंगाल चित्रकला-शैली के विख्यात चित्रकार श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, श्री नन्दलाल बोस, श्री क्षितीन्द्रनाथ मजूमदार इत्यादि ने भी अपने चित्रों में, अभिव्यंजना में, भारतीय प्रतीकों का सहारा लिया है, यद्यपि तूलिका-कौशल में इन पर भी यथार्थवादी चित्रकला का प्रभाव रहा है। इस शैली के चित्रकारों में श्री नन्दलाल बोस ने प्रतीकात्मक भारतीय प्राचीन शैली का सबसे अधिक अध्ययन किया है और अपने चित्रों में इसका प्रयोग भी किया है । देवी-देवताओं के चित्र उन्होंने सबसे अधिक बनाये हैं और उनमें प्रतीकों द्वारा ही अभिव्यंजना हुई है । यामिनी राय इस समय सबसे अधिक विख्यात चित्रकार हैं। इनकी चित्रकला-शैली भी प्रतीकात्मक है और इसमें उन्होंने बड़ी सफलता पायी है। उन्होंने अपने चित्रों में नये प्रतीकों का भी प्रयोग किया है और लोक-कला से प्रेरणा ली है । लोक-कलाएँ भारत में सब जगह प्रतीकात्मक हैं, और इसमें मुख्य बात यह है कि प्रतीकों का रूप सरलतम होता है । आधुनिक कलाकारों में श्रीमती ली गोतमी ने तिब्बती तथा नेपाली प्रतीकात्मक कला से प्रभावित होकर बहुत सुन्दर चित्रों की रचना की है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग में भी वहाँ के विद्यार्थियों ने प्राचीन भारतीय प्रतीकात्मक चित्रकला को आधार मानकर नवीन चित्रों की रचना की है। महेन्द्रनाथ सिंह के चित्र इस दृष्टि- कोण से बहुत ही प्रभावोत्पादक हैं ।