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चित्र-कला को तीन मुख्य प्रवृत्तियाँ

निर्माण ईश्वर या प्रकृति ने किया है । परन्तु निर्माण का अर्थ पुननिर्माण नहीं है । निर्माण का तात्पर्य यह है कि चित्रकार प्रकृति की भाँति स्वयं अदृष्ट वस्तुओं का निर्माण करे। अर्थात् कल्पना के आधार पर नये स्वरूप बनाये। इस प्रकार के चित्र को हम सूक्ष्म चित्र कहते हैं । यह आधुनिक युग की एक देन है ।

ऐसे चित्रों में जो रूप बने हुए होते हैं वे किसी दूसरी वस्तु के या भाव के प्रतिरूप नहीं होते, अर्थात् वे किसी वस्तु के रूप नहीं हैं, न वे पहचाने जा सकते हैं और न उनका नाम- करण ही हो सकता है । इस प्रकार के चित्र को अप्रतिरूपक चित्र कह सकते हैं। इनका आधार केवल मनुष्य की सहज रचनात्मक प्रवृत्ति होती है। किसी वस्तु का पुनर्निर्माण नहीं बल्कि सूक्ष्म, अज्ञात, अदृष्ट का निर्माण । वायु का कोई रूप नहीं दिखाई पड़ता, परन्तु यदि उसे भी चित्रित किया जाय तो एक प्रकार का सूक्ष्म चित्र होगा, यद्यपि शुद्ध सूक्ष्म चित्र फिर भी न होगा क्योंकि वायु एक ज्ञात वस्तु है, उसकी कल्पना हम पहले ही कर चुके हैं और उसी के आधार पर चित्र बनेगा।

सूक्ष्म चित्र बन जाने पर यदि हम उसका विश्लेषण करें तो उसमें कुछ गुण ऐसे दृष्टि- गोचर हो सकते हैं जैसे उनके परस्पर की प्रतिकृति स्वरूप में, सम्बन्धित प्राकार, व्यवस्था, वास्तुरूप, लय, छन्द, सन्तुलन, गति इत्यादि । इस प्रकार के सूक्ष्म चित्र एक प्रकार के ज्यामितिक स्वरूप कहे जा सकते हैं। सूक्ष्म चित्रकला में केवल सूक्ष्म रूप, रंग तथा रेखायों का संयोजन होता है । यह रूप, रेखा या रंग किसी और रूप या भाव के द्योतक नहीं होते । यह कोई अभिव्यक्ति भी नहीं करते । जिस प्रकार वर्षा ऋतु में उमड़ते- घुमड़ते बादलों में नाना प्रकार के रूप बनते-बिगड़ते रहते हैं, उसी प्रकार चित्रकार अपने चित्र में रूप, रंग तथा रेखाओं के सम्मिश्रण से विचित्र रूप बनाते हैं जिनका कोई तात्पर्य नहीं रहता। ऐसे चित्र बनाने में चित्रकार की रुचि क्यों लगती है, इसका उत्तर केवल यही है कि उसके लिए रूप, रेखा तथा रंग खेलने के सामान हैं। उनसे वह खेलता है । जिस प्रकार वर्ष, डेढ़ वर्ष का बालक कभी पेन्सिल पा जाता है तो कागज पर गोदता है और क्रीड़ा का आनन्द लेता है, वह कुछ सोचकर, किसी वस्तु का चित्र नहीं बनाता बल्कि रंग से खेलता है, वह यह भी नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है, उसी भाँति अधुनिक सूक्ष्म चित्रकार रंगों, रूपों तथा रेखाओं से खेलता है, उसका कोई तात्पर्य नहीं होता। बालक केवल हाथ में पेन्सिल लेकर इधर-उधर चलाता है, उसी प्रकार चित्रकार भी करता है। विश्वविख्यात अधुनिक चित्रकार पिकासो ने स्वयं एक बार कहा है-


"मैं आरम्भ से ही नहीं जानता कि मैं क्या चित्रित करने जा रहा हूँ, उसी तरह जैसे मैं