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चित्र-कला को तीन मुख्य प्रवृत्तियाँ

सन्तुष्टि प्राप्त होती है । भारतवर्ष के इतिहास में जब जब ऐसा समय आया है यहां की कला में अलंकार की मात्रा बढ़ी है । गुप्त काल की मूर्ति-कला तथा चित्रकला दोनों में अलंकार प्रधान है। मुगल कालीन चित्रों का तो अलंकार प्राण ही था । इस समय के चित्रों से अगर अलंकार हटा दिया जाय तो शायद वे चित्र बहुत निम्न कोटि के ठहरेंगे।

आलकारिक चित्र इस समय अधिक नहीं मिलते । भारतीय विख्यात चित्रकारों में से बहुत कम ऐसे हैं जिन्होंने इस प्रकार के चित्र बनाये हों। इसका कारण यही है कि इस प्रकार के चित्रों के निर्माण का अभी युग ही नहीं है । इसका यह तात्पर्य नहीं कि ऐसे चित्र लोगों को रुचिकर नहीं लगते प्रत्युत उनके पास इतना समय नहीं है कि ऐसे चित्र बना सकें, न उनकी मनःस्थिति ही ऐसी है । इधर के चित्रकारों में यामिनी राय, राचशु तथा अल्मे- ल्कर के कुछ चित्र आलंकारिक कहे जा सकते हैं। यामिनी राय के चित्र अपनी आलं- कारिकता से अधिक व्यक्त होते हैं। इनका “तुलसी पूजन" प्रालंकारिक कोटि का एक सफल चित्र कहा जा सकता है । अल्मेल्कर के चित्रों में अलंकार नृत्य तथा संगीत के लय का स्वरूप लिये हुए मिलता है । यही बात उनके रंगों के सम्मिश्रण में भी पायी जाती है। इसकी पुष्टि हम उनके ग्राम्यजीवन वाले चित्रों से कर सकते हैं। राचशु के अधिकांश चित्रों में सूक्ष्म अलंकरण, रेखाओं के रूप में बहुत कुशलता से व्यक्त होते हैं। इनके चित्रों पर मुगल तथा राजपूत अलंकरण पद्धति की पर्याप्त छाप है। इनकी “सरस्वती" इन्हींपद्धतियों से निर्मित एक कलाकृति है। भारत की ग्राम्य कला आज भी अलंकार- प्रधान है तथापि उसमें विषय-सौन्दर्य की भी एक निराली झाँकी रहती है।

विषयात्मक प्रवत्ति

वे सभी चित्र जिनमें आलेख्य रूपों तथा भावों को चित्र-बद्ध कर पहचानते हैं, विषय- प्रधान चित्र कहलाते हैं। संसार में आदिकाल से ही विषयप्रधान चित्रों का आलेखन पर्याप्त मात्रा में मिलता है। विषयप्रधान चित्र में अधिकतर चित्रकार प्रकृति के स्वरूपों को किंवा उससे सम्बन्धित भावों को ही स्थान देता है किसी प्राकृतिक दृश्य का चित्र, जिसमें पृथ्वी, आकाश, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, नदी-पहाड़, झरनें आदि के मध्य खड़े चित्रित व्यक्ति अथवा एक व्यक्ति ही चित्रित हो, जैसे एक यात्री का चित्र या अभिसारिका का चित्र । इस प्रकार के चित्र विषयप्रधान चित्र ही कहलायेंगे । इसी प्रकार प्रकृति के अन्य वस्तुओं के चित्र विभिन्न परिस्थितियों के भी बनाये जा सकते हैं, जिनमें कोई भाव या कोई दर्शन छिपा हो । भारतीय चित्रकला में सरस्वती की चार भुजाएँ या विष्णु के चार हाथ और उनके विभिन्न रंगों का आलेखन प्राप्त होता है । सरस्वती के चार हाथों में-एक में