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कर्बला

खाऩदान का निशान मिट जायगा। कोई फ़ातिहा पढ़नेवाला भी न रहेगा। आह! नबी की औलाद पर यह ज़ुल्म! जिनके क़दमों की ख़ाक आँखों में लगानी चाहिए थी उनके तबाही के सामान है। ऐ रसूल पाक, ( प्रकट ) आप जानते है, मौलाना रूमी, कि वालिद का मुझे कब तक इन्तज़ार करना पड़ेगा?

रूमी---आते ही होंगे। ज़ियाद से कुछ बातें हो रही हैं।

मुआ॰---वालिद मुझसे चाहते है कि मैं इस मार्के में शरीक हो जाऊँ, लेकिन अगर ज़ालिमो के हाथ से अख्तियार छीनने के लिए, हक़ की हिमायत के लिए यह पहलू अख्तियार किया जाता, तो सबसे पहले मेरी तलवार म्यान से निकलती, सबसे पहले मैं ज़िहाद का झंडा उठाता, पर हक़ का खून करने के लिए मेरी तलवार कभी बाहर न निकलेगी, और मेरी ज़बान उस वक्त तक मलामत करती रहेगी, जब तक वह तालू से खींच न ली जाय। नबी की मसनद पर, जिसने दुनिया को हिदायत का चिराग़ दिखलाया, जिसने इस्लामी क़ौम की बुनियाद डाली, उस शख़्स को बैठने का मजाज़ नहीं है, जो दीन को पैरो-तले कुचलता हो, जो इन्सानियत के नाम को दाग़ लगाता हो, चाहे वह मेरा बाप ही क्यों न हो। इस्लाम का खलीफ़ा उसे होना चाहिए, जिस पर इन्सानियत को ग़रूर हो, जो दीनदार हो, हक़परस्त हो, बेदार हो, बेलौस हो, दूसरों के लिए नमूना हो, जो ताक़त से नहीं, फौज़ से नहीं, अपने कमाल से, अपने सिफ़ात से दूसरों पर अपना वक़ार जमाए।

[ यज़ीज, जुहाक, ज़ियाद, शरीक, शम्स आदि आते हैं। ]

यज़ीद---आप लोग देखिए, यह मेरा सपूत बेटा है, जो अपने बाप को कुत्ते से भी ज्यादा नापाक समझता है। मेरी फूलों को सेज में यही एक काँटा है, मेरे नियामतों के थाल में यही एक मक्खी है। आप लोग इसे समझाएँ, इसे कायल करें; इसी लिए मैंने इसे यहाँ बुलाया है। इसको समझाइए कि खलीफ़ा के लिए दीनदारी से ज़्यादा मुल्कदारी की ज़रूरत है। दीन मुल्लाओं के लिए है, बादशाहों के लिए नहीं। दीनदारी और मुल्कदारी दो अलग-अलग चीज़े हैं, और एक ही ज़ात में दोनों का मेल मुमकिन नहीं।