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कर्बला

साद---मैं जाऊँ भी तो लड़ नहीं सकता।

[ हुसैन दरिया की तरफ़ जाते हैं। ]

शिमर---अब और भी ग़ज़ब हो गया, पानी पीकर लौटे, तो ख़ुदा जाने, क्या करेंगे। हज्जाज को ताकीद करनी चाहिए कि दरिया का रास्ता न दे। ( हज्जाज को बुलाकर ) हज्जाज, हुसैन को हर्गिज़ दरिया की तरफ़ न जाने देना।

हज्जाज---( स्वगत ) यह अज़ाब क्यों अपने सिर लूँ। मुझे भी तो रसूल से क़यामत में काम पड़ेगा ( प्रकट ) जी हाँ, आदमियों को जमा कर रहा हूँ।

[ हुसैन घोड़े की बाग ढीली कर देते हैं, पर वह पानी की तरफ़ गर्दन नहीं बढ़ाता, मुँह फेरकर हुसैन की रकाब को खींचता है। ]

हुसैन---आह! मेरे प्यारे बेज़बान दोस्त! तू हैवान होकर अाक़ा का इतना लिहाज़ करता है, ये इन्सान होकर अपने रसूल के बेटे के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं। मैं तब तक पानी न पिऊँगा, जब तक तू न पियेगा ( पानी पीना चाहते हैं )।

हज्जाज---हुसैन, तुम यहाँ पानी पी रहे हो, और लश्कर खेमों में घुसी जाती है।

हुसैन---तू सच कहता है?

हज्जाज---यकीन न आये, तो जाकर देख आओ।

हुसैन--–( स्वगत ) इस बेकली की हालत में कोई मुझसे दग़ा नहीं कर सकता। मरते हुए आदमी से दग़ा करके कोई क्यों अपनी इज़्ज़त से हाथ धोयेगा। ( घोड़े को फेर देते हैं और दौड़ाते हुए खेमे की तरफ़ आते हैं ) ओह! इन्सान उससे कहीं ज़्यादा कमीना और कोरबातिन है, जितना मैं समझता था। इस आख़िरी वक्त में मुझसे दग़ा की, और महज़ इसलिए कि मैं पानी न पी सकूँ।

[ फिर मैदान में आकर लश्कर पर टूट पड़ते हैं, सिपाही इधर-उधर भागने लगते हैं। ]

शिमर---( तीर चलाकर ) तुम मेरे ही हाथों मरोगे।

[ तीर हुसैन के मुँह में लगता है, और वह घोड़े से गिर पड़ते हैं। ]