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कर्बला

है, जो चन्द क़दमों के फ़ासले पर खड़े हैं। हम अापको तनहा न जाने देंगे।

अब्बास---साद की शराफ़त पर मुझे भरोसा नहीं है।

हुसैन---मैं उसे इतना कमीना नहीं समझता कि मेरे साथ दग़ा करे। खैर, चलो अगर उसे कोई एतराज़ न होगा, तो वहाँ मौजूद रहना। उसे भी अपने साथ दो आदमियों को रखने की आज़ादी होगी।

[ तीनो आदमी शस्त्र से सुसज्जित होकर चलते हैं। परदा बदलता है। दोनों फ़ौजों के बीच में हुसैन और साद खड़े हैं। हुसैन के साथ अकबर और अब्बास हैं, साद के साथ उसका बेटा और गुलाम। ]

साद---अस्सलामअलेक। या फ़र्ज़न्दे-रसूल, आपने मुझे अपनी खिदमत में हाज़िर होने का मौका दिया, इसके लिए आपका मशकूर हूँ। मुझे क्या इर्शाद है?

हुसैन--–मैंने तुम्हें यह तसफ़िया करने के लिए तकलीफ़ दी है कि आख़िर तुम मुझसे क्या चाहते हो? तुम्हारे वालिद रसूल पाक के रफ़ीक़ों में थे, और अगर बाप की तबीयत का असर कुछ बेटे पर पड़ता है, तो मुझे उम्मीद है कि तुममें इन्सानियत का जौहर मौजूद है। क्या नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ।

साद---आप रसूल पाक के नेवासे हैं।

हुसैन---और यह जानकर भी तुम मुझसे जंग करने आये हो, क्या तुम्हें ख़ुदा का ज़रा भी खौफ़ नहीं है? तुममे ज़रा भी इन्साफ़ नहीं है कि तुम मुझसे जंग करने आये हो, जो तुम्हारे ही भाइयों की दग़ा का शिकार बनकर यहाँ आ फँसा है, और अब यहाँ से वापस जाना चाहता है। क्यों ऐसा काम करते हो, जिसके लिए तुम्हें दुनिया में रुसवाई और अक़बा में रूस्याही हासिल हो?

साद---या हज़रत, मैं क्या करूँ। ख़ुदा जानता है कि मैं कितनी मजबूरी की हालत में यहाँ आया हूँ।

हुसैन--–साद, कोई इन्सान आज तक वह काम करने पर मजबूर नहीं हुआ, जो उसे पसन्द न आया हो। तुमको यकीन है कि मेरे क़त्ल के सिले