पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/२६५

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अगम अथाह महा अति गहिरा वीजन खेत निवारा।। महा सो ध्यान मगन है वैठे काट करम की छारा ।। जिनके सदा अहार अंतर में केवल तत्त विचारा। कहत कवीर सुनो हो गोरख तर सहित परिवारा ॥१९७।। मन न रंगाए रँगाए जोगी कपरा । आसन मारि भैदिर में बैठे नाम छाँड़ि पूजन लगै पथरा । कनवा. फड़ाय जोगी जटवा चढ़ौले दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा। जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले काल जराय जोगी वंनि गैलें हिजरा। मथवा मुंडाय जोगी कपड़ा रंगोले गीता वाँच के होइ गैले लवरा । कहत कवीर सुनो भाई साधो जम दरवजवाँ वाँधल जैवे पकरा ॥१९८॥ साधो भजन भेद है न्यारा। का माला मुद्रा के पहिरे चंदन घुसे लिलारा। : मूंड़ मुंड़ाए जटा रखाए अंग लगाए छारा॥ का पानी पाहन के पूजे कंदमूल फरहारा । कहा नेम तीरथ व्रत कीन्हे जो नहिं तत्त विचारा।। का गाए का पढ़ि दिखलाए का भरमे संसारा। का संध्या तरपन के कीन्हे का पट करम अचारा॥ जैसे बधिक ओट टाटी के हाथ लिए विख चारा। यों वक-ध्यान धरै घट भीतर अपने अंग विकारा॥ दै परचै स्वामी होइ बैठे करें विषय व्यवहारा। शान ध्यान को भरमं न जाने वाद करें निःकारा ।। के कान कुमति अपने से वोझ लिए सिर भारा। विनसतगुरु गुरु के केतिकवहिगेलोभ लहर कीधारा॥ गहिर गंभीर पार नहि पावै खंड अखंड से न्यारा। · दृष्टि अपार चलन को सहजै कटै भरम के जारा॥