पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/२३६

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( २१८ ) पावक कहे पाँव जो. दाहै जल कहे तृखा बुझाई। भोजन कहे भूख जो भागै तो दुनिया तरि जाई. ॥ नर के संग सुवा हरि बोले, हरि प्रताप नहिं जाने । जो कबहूँ उड़ि जाय जंगल को तो हरि सुरति न पान॥ बिनु देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिए का हाई । धन के कहे धनिक जो होतो निरधन रहत न कोई ॥ साँची प्रीति विषय माया से हरि भगतन की हाँसी। कह कबीर एक राम भजे बिन बाँधे जमपुर जासी ॥१२२॥ पंडित देखा सन मों जानी।। कहु धीं छूत कहाँ ते उपजी तबहिं छूत तुम मानी ॥ नादरु विद रुधिर एक संगै घटही में घट सज्जै। अष्ट कमल को पुहुमी आई कहँ यह छूत उपज्जै। . लख चौरासी बहुत बासना सो सव सरि भो माटी। एकै पाट सकल बैठारे सींचि लेत धैां काटी॥ छूतहि जेवन छूतहि अचवन छुतहि जग उपजाया । कह कवीर ते छूत विवर्जित जाके संग न माया ॥१२३॥ पंडित देखो हृदय विचारो। कौन पुरुष को नारी ॥ सहज समाना घट घट वोलै वाको चरित अनूपा । वाको नाम कहा कहि लीजै ना श्रोहि वरन न रूपा ॥ ते मैं काह करे नर चारे क्या तेरा क्या मेरा । राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहुवौं काहि निवेरा ॥ वेद पुरान' कुरान कितेवा नाना भाँति बखानी । हिंदू तुरुक जैन औ जोगी एकल काहु न जानी ॥ छ दरसन में जो परवाना तासु नाम मनमाना । कह कवीर हमहीं हैं वौरे ई सव खलक सयाना ॥१२४॥ माया मोहहिं मोहित कीन्हा । ताते ज्ञान रतन हरि लीन्हा॥