पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१९१

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( १७३ ) जहँ कोटिन ब्रह्मा पढ़ पुरान । जहँ कोटि महादेव धरै ध्यान ।। जहँ कोटि सरस्वति करें राग। जहँ कोटि इंद्र गावने लाग ।। जहँ गण गंधर्व मुनि गनि न जाहि । सो तहँवा परगट आपु बाहिं ।। तहँ चोवा चंदन अरु अवीर। तहँ पुहुप वास भरि अति गंभीर ।। जहँ सुरति सुरंग सुगंध लीन । सव वही लोक में वास कीन । मैं अजर दीप पहुँच्यों सुजाइ । तहँ अजर पुरुप के दरस पाइ॥ सो कह कवीर हृदया लगाइ । यह नरक उधारन नाम जाइ ॥ १९॥ सदा वसंत होत तेहि ठाऊँ। ___ संशय रहित अमरपुर गाऊँ ॥ जहवा रोग सोग नहिं कोई । सदा अनंद करै सब कोई॥ सूरज चंद दिवस नहिं राती। - वरन भेद नहिं जाति अजाती॥ तहँवा जरा मरन नहिं होई । ___ कर विनोद क्रीड़ा सव कोई ॥ १, पुहुप विमान सदा उँजियारा। . . अमृत भोजन करै अहारा॥ काया सुंदर । को , परवाना। ... __ उदित भए जिमि खोड़स भाना।। ।