पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१७१

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

( १५३ ) मन करिसुर मुनि जहड़िया मन के लक्ष दुवार। ये मन चंचल चोरई ई मन शुद्ध ठगार ॥६८८॥ मन मतंग गैयर हनै मनसा भई शचान । जंत्र मंत्र मान नहीं लागी उड़ि उड़ि खान ॥६८९॥ मन गयंद सानै नहीं चलै सुरति कै साथ । दीन महावत क्या करै अंकुश नाहीं हाथ ।।६९०॥ देस विदेसन हैंफिरा मनहीं भरा सुकाल । जाको हूँढ़न फिरौं ताको परा दुकाल ॥६९१॥ मनस्वारथ आपहिरसिक विपय लहरि फहराय । मन के चलते तन चलत ताते सरवसु जाय ॥६९२।। यह मन तो शीतल भया जव उपजा ब्रह्मज्ञान । जेहि वैसंदर जग जरै सो पुनि उदक समान ॥६९३।। विविध सुपने में साँई मिले सोवत लिया जगाय । आँखि न खोलूँ डरपता मत सुपना है जाय ॥६९४॥ सोऊँ तो सुपने मिलूँ जायूँ तो मन माहि। लोचन राते सुभ घड़ी विसरत कवहूँ नाहि ॥६९५।। कविरासाथीसोइं किया दुख सुख जाहि न कोय। हिलि मिलि कै सँग खेलई कधी विछोह न होय ॥६९६॥ तरवर तासु विलंविए वारह मास फलंत । सीतल छाया सघन फल पंछी केल करंत ॥६९७॥ तरवर सरवर संतजन चौथे वरसै मेंह। परमारथ के कारने चारौं धारें . देह ॥१९॥ कविरा सोई पीर है जो जाने पर पीर।

.:. जो पर पीर न जानई सो काफिर वेपीर ।।६९९।।