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कपालकुण्डला
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असन्तोषकी आशंका कर रही हो? युवराजकी या उनकी महिषी की?”

मोती बीबीने थोड़ा अप्रतिभ होकर कहा—“इस लज्जाहीनाको क्यों लजाती हो? दोनोंको असन्तोष हो सकता है।”

मेह०—“लेकिन मैं पूछती हूँ—तुम स्वयं बेगम नाम क्यों धारण नहीं करतीं? सुना था? कुमार सलीम तुम्हारे साथ शादी कर तुम्हें अपनी बेगम बनाना चाहते हैं। उसमें क्या देर है?”

मो०—“मैं स्वभावकी स्वाधीन ठहरी। जो कुछ स्वाधीनता है उसे क्यों नष्ट करूँ? बेगमकी सहचारिणी होकर आसानीसे उड़ीसा भी आ सकी, सलीमकी बेगम होकर क्या इस तरह आ सकती?”

मे०—“जो दिल्लीश्वरकी प्रधान महिषी होगी, उसे उड़ीसा अनेकी जरूरत?”

मो०—“सलीमकी प्रधान महिषी हूँगी, ऐसी स्पर्द्धा तो मैंने कभी नहीं की। इस हिन्दोस्तानमें दिल्लीश्वरकी प्राणेश्वरी होने लायक तो एक मेहरुन्निसा ही है।”

मेहरुन्निसाने सर नीचा कर लिया। थोड़ी देर चुप रहनेके बाद बोली—“बहन! मैं नहीं जानती कि वह बात तुमने मुझे दुःख पहुँचानेके लिये कही, या मेरी थाह लेनेके लिए। लेकिन तुमसे मेरी भीख है मैं शेर बीबी हूँ, हृदयसे उसकी दासी हूँ, भूलकर ऐसी बात न करो।”

निर्लज्जा मोती तिरस्कारसे लजाई नहीं वरन् उसने और भी सहयोग पाया। बोली—“तुम जैसी पतिगतप्राणा हो, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ। इसीलिये तो तुमसे यह बात मैंने कही है। सलीम अभी तक तुम्हारे सौन्दर्यको भूल नहीं सके हैं, मेरे कहनेका यही तात्पर्य है। सावधान रहना।”

मे०—“अब समझी। लेकिन डर किस बात का?”

मोती बीबीने जरा इधर-उधर करनेके बाद कहा—“वैधव्यकी आशंका।”